Monday, May 11, 2009

साहित्य सृजन – मई-जून 2009


“साहित्य सृजन” के सितंबर-अक्तूबर 2008 के अंक के बाद किसी तकनीकी समस्या के चलते अगला अंक पोस्ट करने में काफी विलम्ब हुआ है जिसका हमें खेद है। यद्यपि इस समस्या को अभी आंशिक रूप में ही दूर कर पाना संभव हो सका है, परन्तु हमें विश्वास है कि शीघ्र ही इसे पूर्ण रूप से दूर कर लिया जाएगा और “साहित्य सृजन” निरंतर पोस्ट की जा सकेगी। प्रस्तुत अंक में “मेरी बात” के अन्तर्गत वरिष्ठ कथाकार ‘अपनी बात’ कह रहे हैं। “माँ दिवस” पर विशेष रूप से कथाकार बलराम अग्रवाल ने हमें ‘माँ’ पर केन्द्रित अपनी चार कविताएं प्रेषित की हैं जिन्हें यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है। वरिष्ठ लघुकथाकार सुरेश शर्मा की दो लघुकथाएँ के साथ-साथ अनुवाद के अन्तर्गत पंजाबी की बिलकुल नई कथापीढ़ी के बहुचर्चित कथाकार जतिंदर सिंह हांस की दलित और स्त्री विमर्श को रेखांकित करती कहानी “रखेल” का हिन्दी अनुवाद तथा ‘साहित्य सृजन’ में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हो रहे तोलस्तॉय के उपन्यास “हाज़ी मुराद” (जिसका हिन्दी अनुवाद वरिष्ठ कथाकार-उपन्यासकार रूपसिंह चन्देल ने किया है) की अगली किस्त (किस्त-सात) यहाँ प्रकाशित की जा रही है।
‘साहित्य सृजन’ को और बेहतर बनाने के लिए हमें आपके रचनात्मक सहयोग तथा बेबाक राय की प्रतीक्षा रहेगी।

मेरी बात

इससे ज्यादा त्रासद और क्या हो सकता है ?
-अशोक गुप्ता

श्वान-युगल की रति-क्रिया बचपन में मेरे लिए एक कौतुक भरा दृश्य हुआ करती थी। उपसंहार में उनकी देहों का जुड़ जाना, फिर छूटने की ज़िद्दोज़हद में विपरीतमुखी हो कर प्रलाप की स्थिति में भीड़ में घिर जाना, पत्थरों की मार, और प्राय: संधि भंग करने की कोशिश में संधिस्थल पर लाठी-डंडे का प्रहार। सब कुछ मेरे लिए उन दिनों बस कौतुक ही था।

कुछ बड़े होने पर लगा कि यह पूरा दृश्यविन्यास कौतुक का नहीं बल्कि एक ट्रेजडी है, बेहद दुर्गति भरी त्रासदी … मैं ईश्वर को धन्यवाद देता था कि उसने मनुष्य को ऐसी जलालत से मुक्त रखा है और शायद इसीलिए मनुष्य रति-क्रिया में देह के साथ मन की आवृति की ज़रूरत को समझ पाया। उसने जाना कि एकांत और व्यवधान मुक्त परिवेश ही उस सुख को जुटा पाने की अनिवार्यता है, जिसे प्रत्यक्षत: किसी तीसरे के साक्ष्य की कोई ज़रूरत नहीं होती।

फिर मैंने ज़िंदगी का कुछ अनुभव जुटाया और मुझे लगा कि प्रकृति ने भले ही हमें कैसी भी सुविधा दी हो, हम मनुष्य बहरहाल श्वान गति को ही प्राप्त होने के लिए बाध्य हैं। मन से छ्त्तीस के आंकड़े के साथ देह का जुड़ाव, प्रलाप, आसपास कुतूहल से देखते लोगों की भीड़, बरसते पत्थर… यह सब मनुष्य के साथ भी सच है और त्रासद् है।

मनुष्य के लिए जो कि बुनियादी तौर पर एक संवेदनशील और विचारवान प्राणी है, स्त्री और पुरूष के बीच देह का जुड़ाव एक अद्भुत, चरम आनन्द भरे सुख का रास्ता खोलता है जिससे रचनात्मकता की अनन्त संभावानाएं मुखर होती हैं। इस क्रम में जो तत्व रति क्रिया को पाश्विकता से अलग स्थापित करता है, वह है देह की कामना में मन से जुड़ने की वृति जो देह की गति को एक फ़र्क सी रिदम देती है। उसक झंकार मनुष्य को वायवीय बनाती है। इसी स्थिति को ऑर्गेज्म या चरम सुख कहा जाता है।

इस ऑर्गेज्म की एकांतिकता के बीच, श्वान नियति रचती पहले खड़ी हुई नैतिकता, जिसने विवाह संस्था के रूप में स्त्री की देह पर (सिर्फ़ स्त्री के लिए) यौन शुचिता का प्रतिबंध रच दिया। यह पुरुष प्रधान व्यवस्था का एक कुटिलता पूर्वक रचा हुआ विधान था जो आज सही मायने में उसके लिए भी घाटे का दांव साबित हो रहा है।
इस यौन शुचिता के मूल्य ने स्त्री की देह को चारों तरफ भिनभिनाती मक्खियों के बीच, घर की देहरी पर रखा दूध का प्याला बना दिया। अगर एक भी मक्खी उस प्याले में गिर जाए तो प्याला उठा कर घूरे पर ही फेंका जाना पड़े, फिर चाहें उसे कुत्ते चाटें या कोई और…

इसी व्यवस्था ने स्त्री देह को एक कमोडिटी में बदल दिया और पुरुष एक कन्ज्यूमर हो गया। उपभोक्ता जिसने अपने संज्ञा रूपांतरण में कुछ नहीं गंवाया, उसने यही माना।

… लेकिन यह सच नहीं है। पुरुष ने गंवाया अपना चरम सुख, अपना ऑर्गेज्म, जो होता है तो स्त्री पुरुष दोनों का साझा होता है या होती है सिर्फ़ श्वान-नियति। वस्तु-स्त्री से ऑर्गेज्म नहीं पाया जा सकता, भले ही वह वस्तु रूप में किसी पिता द्वारा दान में मिली हो। वैसे भी, विवाह व्यवस्था में पति और पत्नी के बीच आराध्य और दासी का संबंध हो, ऐसा विधान है। ऐसे में, ऑर्गेज्म दूर दूर तक संभव नही है और यह स्थिति पति पुरूष को भी बराबर से विपन्न करती है, भले ही अपने दंभ के कवच में पुरूष को इसका आभास कभी भी न हो पाए।

ऑर्गेज्म, यानी चरम सुख से रिक्त हो कर देह के जुड़ाव को जितना फीका-कड़ुवा हो जाना चाहिए था, वह हो गया। देह का जुड़ाव पाश्विकता भरा कृत्य बन गया। मात्र मांसपेशियों का आक्रमण। एक देह से दूसरी देह की नोच-खसोट ने रतिक्रिया को एक युद्ध में बदल दिया। इससे कुछ हासिल न होने की खीझ में कृत्रिम आनन्द की तलाश शुरू हो गई। चकाचौंध रोशनी में हो तो शायद मजा आए… दारू पी कर हो…भीड़ में हो… और इस तरह रति संसार में विकृतियाँ भरती चली गईं, इस हद तक कि इस सब को समाज में, बतौर एक फैशन स्वीकृति मिलने लगी। प्रदर्शन का अतिरेक, चरम सुख की जगह उन्माद, ब्लू फिल्में, शोर भरा संगीए और तमाम दूसरी चीज़ें… लेकिन इससे हुआ क्या ? नैतिकता की और ज्यादा ऐसी- तैसी हुई।

पहले नैतिकता की स्थापना ने सुख छीना था फिर सुख के छिन जाने से नैतिकता का और ज्यादा क्षय हुआ। वह तो होना ही था क्योंकि इस नैतिकता के आधार में सुव्यवस्था नहीं थी, केवल पुरुषवादी कुटिलता थी जो स्त्री पर आधिपत्य बनाये रखने का एक सुनियोजित तंत्र थी, वरना केवल माया मेम साहब ही क्यों पीतीं ज़हर का प्याला…?

छद्म और कुटिल सोच की उपज नैतिकता ने समाज को हमेशा विकृति की ओर धकेला है। इससे आस्था मरी है, प्रेम वर्जित हुआ है, मानवीयता की क्षति हुई है और स्वार्थवृति बढ़ी है। यौन तृप्ति से वंचित समाज में एक ओर दुधमुंही बच्चियों तक से बलात्कार हुए हैं, पिता और भाई भी अपनी भूमिका में मात्र पुरुष रह जाने से बच नहीं पाए हैं, तो दूसरी ओर प्रेमी युगल ने या तो पत्थरों की बौछार झेली है या आत्महत्या… ।

नैतिकता के आतंक से एकांत संदर्भ सड़क पर आ गया और उसने श्वान नियति सा उपसंहार पाया… इससे ज्यादा त्रासद और क्या हो सकता है?

यह सही समय है जब प्रेम की वापसी का उपक्रम किया जाए और नैतिकता के नये आयाम प्रेमवृति तय करें। उसके बिना समाज में सहजता नहीं लौटेगी। सौ-सौ चैनलों का मनोरंजन भी आनन्दहीनता से उपजा क्षय नहीं भर पाएगा। इंसान कुत्ता होता रहेगा। बूढ़े भौंकेंगे, भुख्खड़ लौंडे उसे पत्थर मारेंगे।
००

29 जनवरी 1947 को देहरादून में जन्म। इंजीनियरिंग और मैनेजमेण्ट की पढ़ाई। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढाई के दौरान ही साहित्य से जुड़ाव ।अब तक सौ से अधिक कहानियां, अनेकों कविताएं, दर्जन भर के लगभग समीक्षाएं, दो कहानी संग्रह, एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। एक उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य। बेनजीर भुट्टो की आत्मकथा Daughter of the East का हिन्दी में अनुवाद।सम्पर्क : बी -11/45, सेक्टर 18, रोहिणी, दिल्ली – 110089 मोबाईल नं- 09871187875

कविता



“माँ” पर बलराम अग्रवाल की चार कविताएं
(‘माँ दिवस’ पर विशेष)

॥1॥
अब सिर्फ देह नहीं रही माँ
पहले भी
सिर्फ देह वह थी ही कब?
वह सु-संस्कार थी
अब भी है
और रहेगी आगे भी
वह जुझारूपन थी
अब भी है
और रहेगी आगे भी
समरांगण में
साक्षात विजय थी वह
अब भी है
और रहेगी आगे भी।
वह गई कहीं नहीं,
विस्तार पा गई है पितरों जितना।
पहले उसकी हथेलियाँ,
छूती थीं हमें
और हमारी त्वचा कराती थी आभास
उस छुअन का,
उसकी नजरें
चूमती थीं हमें
और हमारी इन्द्रियाँ महसूस करती थीं
दैविक तृप्ति का।
अब उसके आशीष
बरसते रहेंगे हम पर
सुहानी धूप और शीतल चाँदनी बनकर।
माँ जब नहीं थी वहाँ,
बादल बरसाते थे पानी;
अब वे अमृत बरसाएँगे।
हरे-भरे रखेंगे
देश के खेतों-बागों-बगीचों को
भरा-पूरा रखेंगे खलिहानों को।
माँ
कभी भी
जाती कहीं नहीं देह को छोड़कर
विस्तार पा जाती है पितरों जितना।

॥2॥
जल में कुम्भ
कुम्भ में जल है
बाहर-भीतर पानी—
को पढ़कर
अपने छोटे-से कमरे से
कभी मैं बाहर होता हूँ
और कभी भीतर
पर
लाख प्रयत्नों के बावजूद भी
समा सकूँ कमरे को
स्वयं में
इतना विस्तृत नहीं हो पाता
लेकिन
कबीर की इस बानी को
सिद्ध कर दिखाने वाली
चतुर जादूगरनी निकली माँ
अपने आप को
पूरी उम्र
वह पिता के भीतर भी रखे रही
और
बाहर भी

॥3॥
खरहरी खाट पर
उलट-पलट कर
पूरे बदन की मालिश कर देने
और
कानों में दो-दो बूँद
सरसों का तेल डाल देने के बाद
एक बूँद तेल
नाभि में भी
जरूर टपकाती थी माँ
पूरे शरीर का केन्द्र है ये
मैल
इसमें भी आता है
वह कहती थी
साफ रहना चाहिए
केन्द्र को जरूर

॥4॥
बबुआ
रो रहा था
कई-कई बाल विशेषज्ञों पर
चढ़ा आए नकदी
लेकिन
न बंद हुआ न कम
उसका रोना
माँ ने
ध्यान-से देखा
परखा उसके रोने को
बोली—घबराओ मत
पछेरुओं से परेशान है बबुआ
साफ रुई का एक फाहा लाओ
और
घिसा हुआ थोड़ा-सा माजूफल
नितम्बों के बीच
फाहा कूच
पीठ को थपथपा
बबुआ को सुला दिया माँ ने
बीमारियों को
बच्चों से दूर रखनेवाली
बड़ी ही सिद्ध
वैद्य थी माँ!
00


बलराम अग्रवाल का जन्म २६ नवंबर, १९५२ को उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर में हुआ था. आपने हिन्दी साहित्य में एम.ए., अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा, और ’समकालीन हिन्दी लघुकथा का मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन’ विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की.
लेखन व सम्पादन : समकालीन हिन्दी लघुकथा के चर्चित हस्ताक्षर. सभी स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, लघुकथा आदि प्रकाशित. अनेक रचनाएं विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनूदित व प्रशंसित . भारतेम्दु हरिश्चन्द्र , प्रेमचंद, प्रसाद, शरत, रवींद्रनाथ टैगोर, बालशौरि रेड्डी आदि वरिष्ठ कथाकारों की चर्चित/ज़ब्त कहानियों के संकलनों के अतिरिक्त कुछेक लघु-पत्रिकाओं व लघुकथा-विशेषांकों का संपादन. प्रेमचंद की लघुकथाओं के संकलन ’दरवाज़ा’ (२००५) का संपादन. ’अडमान-निकोबार की लोककथाएं’(२००१) का अंग्रेजी से अनुवाद व पुनर्लेखन.
हिन्दीतर भारतीय कथा-साहित्य की श्रृंखला में ’तेलुगु की सर्वश्रेष्ठ कहानियां’ (१९९७) तथा ’मलयालम की चर्चित लघुकथाएं’ (१९९७) के बाद संप्रति तेलुगु की लघुकथाओं पर कार्यरत. अनेक विदेशी लुघुकथाओं पर कार्यरत. अनेक विदेशी लघुकथाओं व कहानियों के अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित.
अनेक वर्षों तक रंगमंच से जुड़ाव. कुछ रंगमंचीय नाटकों हेतु गीत-लेखन भी. हिन्दी फीचर फिल्म ’कोख’ (१९९४) के संवाद-लेखन में सहयोग.
कथा-संग्रह ’सरसों के फूल’ (१९९४), ’दूसरा भीम’ (१९९६) और ’चन्ना चरनदास’ (२००४) प्रकाशित.
सम्प्रति : स्वतन्त्र लेखन .
हिन्दी ब्लॉग :
www.jangatha.blogspot.com
www.kathayatra.blogspot.com
सम्पर्क : एम-७०, नवीन शाहदरा, दिल्ली -११००३२.
फोन . ०११-२२३२३२४९,मो. ०९९६८०९४४३१

लघुकथाएं



दो लघुकथाएं – सुरेश शर्मा

कच्चे धागे


पति-पत्नी में मन-मुटाव जब चरमसीमा पर जा पहुँचा तो बात तलाक तक जा पहुँची। तलाक के लिए दोनों राजी-खुशी तैयार थे। किंतु दो वर्षीय बालक पर अपना अधिकार छोड़ने को कतई तैयार नहीं थे।
“बालक तो मेरे साथ ही रहेगा।” पति ने आदेश दिया।
“नहीं, उसे तो मैं किसी भी हालत में नहीं छोड़ सकती।” पत्नी ने भी सख़्त रुख अपनाया।
काफी बहस के बाद दोनों टस से मस नहीं हो रहे थे। अंत में पति आवेश में आते हुए बोला- “ठीक है, मैं इसके लिए कोर्ट में जाऊँगा।”
“तुम्हारी मर्जी, जाओ कोर्ट। जो बात ढकी हुई है, अच्छा है, ज़माने को भी मालूम पड़ जाए। डी एन ए टैस्ट के बारे में तो तुमने सुना ही होगा।” पत्नी ने अंतिम शस्त्र का उपयोग किया। पति इस आकस्मिक आक्रमण को सहन नहीं कर सका। ऊपर से नीचे तक कांप उठा। भयातुर स्वर में धीमे स्वर में बोला- “ठीक ह, बच्चा मेरे पास रहे या तुम्हारे, क्या फ़र्क पड़ता है।”
उसके जाने के बाद पत्नी दु:खी होते हुए बुदबुदाई, “काश, मुझ पर नहीं तो अपने आप पर ही विश्वास किया होता।”
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नया मकान

रामलाल जब इस मकान में रहने आया, तभी से माँ का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। काफी इलाज करवाने पर भी माँ की दशा में सुधार नही हो रहा था। डॉक्टरों की फीस तथा दवाइयों के खर्चों तथा बच्चों की पढ़ाई के भारी खर्चों ने उसके सीमित बजट में सेंध लगा दी थी। ऐसे में लोक-लाज के कारण लोगों की सलाह मानकर बार-बार डॉक्टर, अस्पताल, दवाइयाँ बदलते-बदलते रामलाल को आर्थिक, मानसिक और शारीरिक संकट ने हिला कर रख दिया। उसे कष्ट में देखकर रिश्तेदारों, मित्रों ने सुझाया कि तुम्हारा मकान ही अशुभ है, इसे बदल डालो। मगर एक तो वह ऑफिस के नज़दीक होने से, दूसरा बड़ा कारण कि इतने कम किराये पर नया मकान कहाँ मिलेगा, यही सोचकर कुछ समय तक वह लोगों की राय को अनसुनी करता रहा। लेकिन जब पानी सिर से ऊपर आ गया तब रामलाल ने आख़िर दूसरा मकान खोज ही लिया। दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है। पहले पंडितों की राय ली गई। जब पंडितों ने मकान शुभ-फलदायी बताया तो वह उसमें रहने आ गया।
अभी एक माह भी नहीं हुआ था कि एक दिन माँ की तबीयत ऐसी बिगड़ी कि आख़िर वह चल बसी। अर्थी को कंधा देते समय रामलाल के दिमाग में विचार कौंधा – पंडित ने ठीक ही कहा था कि नया मकान शुभ-फलदायी रहेगा।
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सुरेश शर्मा
6 मई 1938, इन्दौर(मध्य प्रदेश)
कृतियाँ : छोटे लोग, शोभा, थके पाँव(सभी कहानी संग्रह)। 40 से अधिक लघुकथा संकलनों में लघुकथाएं संकलित। ‘कहानी और कहानी’ वार्षिकी, ‘समान्तर’, ‘क्षतिज’, ‘संयोग –साहित्य’ के लिए संपादकीय सहयोग। मालवा अंचल के कथाकारों की चुनिंदा लघुकथाओं पर आधारित लघुकथा संकलन “काली माटी” का संपादन।
सम्मान : लघुकथा लेखन के लिए कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
सम्पर्क : 235, क्लर्क कालोनी, इन्दौर-452011
दूरभाष : 0731-2553260/09926080810

पंजाबी कहानी


रखेल
जतिंदर सिंह हांस
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

चेयरमैन : सरपंचनी कुर्सी पर बैठी सरपंच बनने की सज़ा भुगत रही है। हालांकि बैठी वह थाने में है, पर मन उसका घर में भटक रहा है। घर में चूल्हा ठंडा पड़ा होगा। बच्चे और गुलगुलजारा भूखे-प्यासे होंगे। गुलगुलजारा तो जल भुनकर कोयला हो गया होगा। उसकी व्हील-चेयर इधर-उधर घूम रही होगी, मानो साले को मिर्चें लगी हों। जल भुन तो तभी गया होगा जब उसे पता चला होगा कि सरपंचनी मेरे साथ गयी है। उसका चेहरा चुनाव में हारे उम्मीदवार की तरह हो गया होगा। बड़बड़ाया होगा-''कुत्ती औरत, कार का मजा लेने के लिए फिसल गयी।''
थानेदार थाने में नहीं है। कहीं बाहर गया हुआ है। मेरी उससे मोबाइल पर बात हुई है। कहता है-''जब हुक्म करोगे, आ जाऊँगा सरकार।'' जब तक मंत्री साहब का हाथ मेरे सिर पर है, तब तक ऐसे ही चलेगा। हेमू बनिये की तरह चमड़े की चलायेंगे। हम हुए मंत्री साहब के जिगर के टुकड़े ! पुलिस हुई हमारी रखेल ! सरपंचनी को इस तरह बैठा देखकर मेरा पेट हँसने लगता है। ये वो लोग हैं जो जल्दी ही पैर छोड़ जाते हैं। इसीलिए इसे आज अच्छी तरह टांग के नीचे से निकालकर घर भेजना है। ताकि हर किसी के सामने बोलने की हिम्मत न करे। इसका तकिया-कलाम 'हाँ जी, हाँ जी' कभी 'ना जी, ना जी' न हो जाए। कई बार मन में आता है- क्यों लिए फिरता हूँ, इस दो टके की जनानी को कार में। साली को अक्ल, न शक्ल। पर साली सियासत बड़ी कुत्ती चीज है। अगर वोट लेने की मजबूरी न हो, दुनिया को सुई के छेद में से निकाल दूँ।
आज वाला केस भी अजीब है। देबी और पाली की घरवालियाँ आपस में लड़ पड़ीं। दोनों सगे भाई हैं। उधर लड़ने वाली सगी बहनें हैं। एक ने नाली में रोड़ा लगाकर पानी रोक दिया। दूसरी ने नाली में से रोड़ा निकाल दिया। फिर दोनों एक-दूजे को गालियाँ बकने लगीं, आपस में गुत्थम-गुत्था हो गयीं। पाली और देबी, माँ के पिये दूध की लाज रखने के लिए लाठियाँ उठा लाए।
राज़ीनामा तो इनका गाँव में ही हो सकता था। बात इतनी खास नहीं थी। पर थाने गए बगैर इन्हें रोटी हज़म नहीं होती। जैसा कि चुटकला सुनाया करते हैं। पुलिस दोनों दलों को जूते मारकर पूछती है, ''राजी ?'' दोनों दल मार खाकर हाथ जोड़कर कहते हैं, '' हाँ जी, राजी।''
थानेदार कहता है, ''फिर निकालो नामा।'' अगर नोट नहीं देने तो फिर कोर्ट-कचहरी का चक्कर। पार्टी अपनी गरज को मार भी खाती है, नामा भी देती है। थानेदार हाथ रंग लेता है। मेरी बहुत इज्ज़त करता है। कभी-कभी जब बड़ी रकम हाथ लगती है, दसवां हिस्सा मेरा भी निकाल देता है। जिसे वह तेल-पानी का खर्चा कहकर ज़बरन मेरी जेब में ठूंस देता है। बीस साल हो गए सरपंची करते और पार्टी के दूसरे पदों पर रहकर इलाके की सेवा करते हुए। मैंने तो यह निष्कर्ष निकाल रखा है कि राज़ीनामा कभी गाँव में होने ही न दो, दोनों पार्टियों को थाने पहुँचाओ। तभी दोनों दल तुम्हें बाप की तरह पूजते हैं। गाँव में जिस किसी को समझाने के लिए कुछ कह दो, उसी का मुँह फूल जाता है। वोट टूट जाते हैं। जिन्होंने लड़ाई छेड़ी थी, वे दोनों औरत होने का फायदा उठाकर घर में बैठी हैं। मुख्तयार कौर जिसका जुर्म सरपंच होना ही है, वह थाने बैठी है। दो धड़ों में बंटे गाँव में थानेदार के न आने के कारण जैसे सूखा पड़ गया है। लोग टोलियाँ बना-बनाकर आपस में बातें किये जाते हैं। घास खोदने वाली जात कुर्सी पर डटी बैठी है। मेड़ पर घास खोदती यह खुश होती है, पर कुर्सी पर होंठ लटकाकर ऐसी बैठी है जैसे इसके माँ-बाप मर गए हों। इसे देखकर हँसी आती है। करना करवाना इसने कुछ भी नहीं। थानेदार से मार खाकर, उसे पैसे देकर, दोनों दलों ने लिखत में राज़ीनामा करना है। इसने उस राज़ीनामे पर टूटे हुए अक्षरों में मुख्तयार कौर लिखना है। मुझे इस तरह मन मसोसकर बैठी पर तरस नहीं आता, न ही इसके भूखे-प्यासे बैठे परिवार पर, न ही बेज़ुबान पशुओं पर, न ही इसके अपाहिज पति गुलगुलजारे पर। बल्कि उसकी घूमती व्हील-चेयर के बारे में सोचकर हँसी आती है। मन में ठंडक पड़ती है। उस साले ने मुझे भी इसी तरह तड़पाया था। उस समय मेरे दिल्ली की पार्लियामेंट या चंडीगढ़ विधानसभा में जाने के चांस बनते थे। गुलगुलजारे साले ने ऐसी लात खींची, चौरासी वाले चक्कर में जा फँसा। अब तक तानी-बानी ठीक नहीं बैठी। साली चेअरमैनी के साथ ही गुजारा करना पड़ा। चेअरमैनी भी जूतम-पजार करके ली थी। नहीं तो मैं मंत्री बना लाल बत्ती वाली गाड़ी में घूमता। सलूट बजते, माया की वर्षा होती। कसूर कुछ मेरा भी था। मेरा अपना अनुभव कि चार साल ग्यारह महीने इन लोगों को जितना चाहे कूटते रहो, पर वोटों से महीनाभर पहले पुच-पुच करो तो सब कुछ भूल-भुलाकर ये पूंछ हिलाने लगते हैं- गलत साबित हो गया था। लोग मेरे द्वारा कुछ अधिक ही कूटे गए थे। मंत्री के साथ मिलकर पंचायती ज़मीन का सौ किल्ला दबाने के वक्त लोग पुलिस की मारपीट और थाने-कचहरियों को नहीं भूले थे। हरिजन बस्ती की वोटों पर मैं उछलता फिरता था। वे सभी गुलगुलजारे ने बहुजन समाज पार्टी की ओर से खड़े होकर तोड़कर रख दीं। मैंने इसे बैठ जाने के लिए बहुत लालच दिए, पर यह टस से मस न हुआ। बोला- काशी राम कहते हैं... हमारा बहुजन का राज आने वाला है। वोटें हालांकि इसे घर की ही मिलीं, पर इतनी सी वोटों पर ही मैं हार गया। ऊपर से चाहे मैं कितना ही 'हाँ भैया' करूँ, पर अन्दर से मैं इससे खार खाता हूँ।
सरपंची हार कर मेरे मन में उस लड़की वाली कहानी घूमने लगी जो अपनी सहेली को बताती है-''बापू मेरी शादी नहीं करता।''
सहेली कहती है-''ले, बेटियाँ भी किसी ने घर में रखी हैं।''
उसकी मंगनी हुई। सहेली ऑंखें-सी नचा कर बोली, ''क्यों, अब खुश है ?''
लड़की ने कहा, ''मुझे अभी भी नहीं लगता कि मेरा ब्याह होगा।''
विवाह का दिन तय हो गया। फेरे हो गए। डोली वाली कार में बैठने के लिए लड़की चल पड़ी। सहेली ने उसकी बगल में चिकौटी काटकर कान में कहा, ''अब तो खुश है ?'' लड़की बोली, ''अभी भी मेरे मन में धुकधुक-सी है।''
लड़की डोली वाली कार में बैठ गयी। लड़के का बाप ऊपर से पैसे फेंकने लगा। कार धीमे-धीमे चलने लगी। लड़की रोने का शगुन-सा करने लगी। लड़की का बाप लड़के वालों के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। बोला- ''भाई बारात वालो, मैंने अपना पूरा जोर लगाकर ये कारज किया है। अपनी ओर से बारात की पूरा सेवा की है। आप खुश हैं ?''
बारातिये बोले, ''हाँ जी, हम तो बहुत ही खुश हैं।''
बाप ने झट से कार का दरवाजा खोला। लड़की को बांह से पकड़कर बाहर खींच लिया। बोला- ''उतर बेटी, तू तो रोती है, ये ससुरे के खुश हुए फिरते हैं।''
मेरे साथ भी उस लड़की जैसा ही हुआ था। हाई-कमान ने पार्टी फंड लेकर मेरा मंगना-सा कर दिया। मेरी जायज़-नाजायज़ ढंग से जमा की गयी माया, खाड़कुओं के साथ वाले संबंध माफ करके सात फेरे भी दिला दिए। लेकिन, टिकट देते समय यह दलील देकर डोली वाली कार में से बाहर खींच लिया कि जो सरपंची नहीं जीत सकता, वह एम.एल.ए. या एम.पी. कैसे बन सकता है। उस वक्त हमारी पार्टी की हवा अच्छी थी। लोग कहते थे कि अगर इस बार गधे को भी टिकट मिल जाए तो लोग उसे भी एम.एल.ए. बना देंगे। हाई-कमान ने यह तजरबा हमारे इलाके में किया। वह गधा पाँच साल शिक्षा मंत्री रहा।
यह निष्कर्ष मेरा उसी समय का निकाला हुआ है कि आदमी का आधार अपने गाँव में मजबूत होना चाहिए। गाँव में कोई भी अच्छी-बुरी घटना घटती है, उसका हल सियासी हितों के आधार पर करो। अगले बरसों में मैं चेअरमैनी करता रहा और गाँव में अपना आधार मजबूत करता रहा। लेकिन, इस बार हमारा गाँव आरक्षित हो गया।
गिद्धे में लड़कियाँ बोली डालते हुए तमाशा-सा किया करती हैं। एक लड़की सिर पर चुन्नी लपेटकर 'करतारे का भाइया' बन जाती है। दूसरी लड़की बोली डालती है-
-रे, करतारे के भाइया !
-हाँ जी।
-रे, मेरे पीर कलेजे !
-हाँ जी।
-रे, दो खट्टियाँ ला दे।
-हाँ जी।
-रे दो मिट्ठियाँ ला दे।
-हाँ जी।
-रे मैं मरती जाती...
-हाँ जी।
वह तंग आकर कहती है-
-रे, तेरी मर जाए हाँ जी !
-हाँ जी।
मुझे ऐसे उम्मीदवार की आवश्यकता थी जो मेरी हाँ में हाँ मिलाये। उसका हर उत्तर 'हाँ जी' हो। सबसे पहले मेरी निगाह हमारे घर में काम करती माया पर पड़ी। वह हमारी सीरी भइये की घरवाली थी। मैं उसे मजाक में मायावती भी कह देता। भइया साला मूर्ख निकला, बोला, ''हम क्यूं चमरवा बनें, हम तो यादव हैं।'' चमरवा तो मैं उसे बना लेता, फिर सोचा- इस उड़ते पंछी का क्या पता, कब उड़ जाए। अगर इसने किसी के सामने भौंक दिया तो सारे किए कराये पर पानी फिर जाएगा। भइये के जवाब देने के बाद बस्ती और बाज़ीगरों के डेरे पर निगाह दौड़ाई।
हम निजी सम्पर्क प्रोग्राम के अधीन घर-घर जाकर लोगों को शराब बांट रहे थे और अपना चुनाव चिह्न समझा रहे थे। मेरा फार्मूला है कि वोट मांगने दुश्मन के घर भी जाओ। माना कि 'गुग्गा पुत्त' नहीं बख्शेगा, पर माथा तो टेकने से नहीं रोकेगा। हम इनके घर गए। साथ में और लोग भी थे। मैंने मुख्तियारो से कहा, ''मुख्तयार कौर, इस बार हाथ को वोट डालनी है।''
मेरे साथ गए बुज़ुर्गों से पल्ला करते हुए उसने कहा, ''हाँ जी, सरकार जी, हम तो हर बार आपके पंथ (अकालियों) को ही वोट डालते हैं।''
सभी हँसने लगे तो यह घबरा गयी। मैंने बात संभाली, ''मुख्तयार कौर, इस बार पंथ की तरफ नहीं हाथ की तरफ हूँ। मोहरें हमने हाथ पर लगानी हैं। मैंने उनकी तरफ रहकर भी देख लिया, पंथ-वंथ उनका कोई नहीं। उनका तो वह काम है कि 'नानक नाम चढ़दी कला, तेरे भाणे मेरे पुत्त दा भला।''
वह शर्मसार-सी होकर कहती रही, ''सरदार जी, हमने क्या लेना किसी पंथ-वंथ से, हमारा तो सब कुछ आप ही हो।''
ऐसे ही उम्मीदवार की मुझे ज़रूरत थी। बात मुख्तियारे के मान जाने की नहीं थी। उसने तो 'हाँ जी, हाँ जी' ही कह देना था। बात तो गुलगुलजारे के मानने की थी। शाम को घर जाकर इन्हें समझाया। गुलगुलजारा पैरों पर पानी नहीं पड़ने देता था। साला लंगड़दीन !
''ये तो अनपढ़ है।''
''अपनी पार्लियामेंट के आधे नेता अनपढ़ हैं। वे देश चलाये जाते हैं। इसने तो गाँव को देखना है। जब तू सरपंच बना हुआ था, तू कौन-सा बी.ए. पास था।''
''हम गरीब हैं। इतना खर्च कहाँ से करेंगे। पिछली बार खर्चा न करने के कारण मेरा डिब्बा खाली निकला।''
''तू क्या समझता है, स्कूल के आगे गोलियाँ-टाफियाँ बेचकर टाटा-बिरला बन जाएगा। मुख्तियारो घास खोद-खोद कर इंदिरा गांधी बन जाएगी। सरपंची तो पहली सीढ़ी है। अपने हलके का एम.एल.ए. जिसका बाप टांगा चलाया करता था, वह अब कारू बादशाह से भी ज्यादा माया इकट्ठी किए बैठा है। चुनाव में तेरा सारा खर्चा मैं करुँगा। फिर लाखों की ग्रांटें मिलेंगी। छत लेना पक्का मकान। खाते रहना सरकारी पैसा।''
''पर सरदार, हमारी पार्टी ने तो बन्दा खड़ा किया हुआ है।''
''तुझे सौ की एक सुनाऊँ, पार्टी-वार्टी कुछ नहीं होती। यूं ही कुर्सियाँ लेने के लिए पार्टियों के नाम रखे हुए हैं। गुलजार सिंह, सब कुछ कुर्सी के लिए होता है। राज यहाँ न अकालियों का, न कांग्रेसियों का, न भाजपा का। राज है यहाँ सरमायेदारों का। अगर हमने इनसे राज छीनना है तो हमें उठना होगा। अब आ रहा है पंचायती राज। मैं तो चाहता था, यह राज हमारी भाभी करे, आगे तुम्हारी मर्जी।'' मेरे शब्दजाल में फंस कर उसने 'जैसे आपकी मर्जी' कहकर हथियार फेंक दिए।
जैसे-तैसे करके मैंने इसे सरपंचनी बनवा दिया। ग्रांट इससे गलत ढंग से खर्च करवा दी। अब अगर यह अपना सब कुछ भी बेच दे, सरकारी पैसा जो इसने नहीं खाया, इससे वापस होने से रहा।
थानेदार आ गया। दोनों दलों के आदमी सींखचों से बाहर निकाल लाए गए। राज़ीनामे पर दस्तख़त-अंगूठे हुए। दोनों दल अपनी-अपनी ट्रालियों में जा बैठे। मुख्तियारो कार में आ बैठी। ट्रालियाँ अभी खड़ी हैं क्योंकि अभी नंबरदार नहीं आया है। मैंने मुख्तियारो से कहा, ''हो तो अंधेरा ही गया, पर थानेदार के आए बग़ैर बात खत्म नहीं होनी थी। तेरे दस्तख्तों के बिना राज़ीनामा नहीं होना था।'' कह कर मैंने उसे चौड़ा कर दिया। वह बोली, ''हम अब गाँव का फैसला गाँव में ही कर लिया करेंगे। अपने लोगों को थाणे-कचेरियों में नहीं भटकने देंगे।'' उसके मुँह से सियानी-सी बात सुन कर मैं हैरान रह गया। नंबरदार को हांक मारते-मारते रुक गया। सरपंचनी की छातियों की ओर देखकर कार आगे बढ़ा ली। कार के अन्दर वाली लाइट का स्विच आफ कर दिया।

गुलजारा : सरकारी हाई-स्कूल के सामने टाफियाँ-बिस्कुट और दूसरा छोटा-मोटा सामान बेचने के लिए पूरी दिहाड़ी दुकान लगाकर बैठा रहा। पर आज कमाई अधिक नहीं हुई।
पी.टी. मास्टर हाथ में अखबार लिए निकला। अखबार हर वक्त उसके हाथ में ही होता है। बड़ा कमीना आदमी है। खाता भी रहेगा और साथ में कहता भी रहेगा- 'भई सरपंच, सामान बढ़िया रखा कर।' जितनी कमाई होती है, उससे अधिक नुकसान ये मोटे पेट वाला कर देता है। पर आज उसका व्यवहार बदला हुआ था।
''सरपंच, तुम्हारी तो मौजें हैं। पंचायती राज आ गया अब। ये देख, सरकार पंचायतों को कितने अधिकार दिए जा रही है। ये देख, आज का अख़बार, शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग तुम्हारे अंडर हैं। अगर अब तू कहा करेगा कि मास्टर जी, बच्चों को फिर पढ़ाना, पहले मेरी ये दुकान देखना, तो मुझे देखनी ही पड़ेगी। भई अब हमारे पर मेहरबानी रखना...ं।''
सरपंचनी तो मेरी घरवाली है मुख्तियारो, पर लोग मुझे ही सरपंच कहे जाते हैं।
''छोड़ो जी, क्यूं मजाक करते हो। आप तो हमारे अफसर हो।'' मैंने कहा। लेकिन, मन में खुशी के लड्डू फूटने लगे। मन में सोचा, ''जरा अंडर हो जाओ बेटा, फिर देखना हाथ।'' एक फायदा तो होगा ही, हैड-मास्टर आकर घूरा नहीं करेगा कि तेरी चीजें खाकर बच्चे बीमार हो जाते हैं। न ही ये मोटे पेट वाला मेरी चीजें डकार कर मेरा नुकसान किया करेगा।
''नहीं मास्टर जी, सरपंच तनखाहें कहाँ से दिया करेंगे।'' मैंने अपनी चिन्ता ज़ाहिर की।
''उसकी तू चिन्ता न कर... बस हमारे ऊपर कृपा रखना...ं।'' कह कर पकौड़ियों की मुट्ठी भर कर वह स्कूल की ओर चल दिया।
मेरा मन हुआ, पी.टी. मास्टर से अख़बार लेकर उसकी फोटो कापियाँ करवा कर गली-गली में लगवा दूँ। हर एक को बताता घूमूंं कि आ गया जनता का राज। अख़बारें तो कब से ख़बरें दे रही हैं कि पंचायती राज होने वाला है। पंद्रह अगस्त को ईसड़ू में होने वाली सभा में लीडर भी तो भाषण झाड़ते थे। कहते थे, ''अंग्रेजों के जाने के बाद अब धोतियों वाले काले अंग्रेजों के हाथ में राज आ गया। हमारे देश का भला तब तक नहीं होगा जब तक शक्तियाँ निचले स्तर पर नहीं बांटी जातीं। यानी पंचायती राज।'' शायद वही पंचायती राज आ गया। मुख्तियारो को सरपंचनी बनाकर मैंने कोई गलती नहीं की।
सामान समेटकर घर को चल पड़ता हूँ। घर जाकर मुख्तियारो को बताऊँ- जैसे इंदिरा देश की रानी थी, मायावती किसी सूबे की रानी है, वैसे तू गाँव की रानी है। इसे कहते हैं- ऊपर की नीचे, नीचे की ऊपर। सरपंचों के भी अधिकार होते हैं। लोग यों ही नहीं सरपंची के पीछे लड़ते घूमते। चेअरमैन के कहने के मुताबिक, कुर्सी बड़ी कुत्ती चीज है।
खुद-ब-खुद मेरे होंठ गुनगुनाने लगे-

होवां नशियां' च गहिरा
दसां शाम नूं दुपहिरा
किहड़ा ढेका ला लूं पहिरा
झल्लणी मुताज ना
ढाई घंटे साडे ते
किसे दा राज ना।

मुझे लगा मानो मेरी व्हील-चेअर लाल बत्ती वाली कार हो। सड़कों पर चलते-फिरते लोग कीड़े-मकोड़े हों। अब समझ में आया कि जो लोग हमारे बीच से कुर्सियों के मालिक बनते हैं, वे बड़े लोगों की बोली क्यों बोलने लगते हैं। अभी अख़बार में ख़बर ही आयी है। लोग 'सरपंच जी, सरपंच जी' कहकर झुक-झुककर सलाम कर रहे हैं। अभी मेरी पहियों वाली कुर्सी गाँव के बाहर ही थी कि 'कीकनियों' का भजना खेतों की ओर जाता मिल गया। बोला, ''आ भई खड़पैंचा, तुझे कैसा गाँव का मोहरी बनाया, तू जिम्मेवारी समझता ही नहीं। गाँव में आंधी चल रही है, तू आराम से व्यापार करता घूम रहा है। तुझे गाँव की जरा भी फिकर है ? सारा गाँव थाणे पहुँचा हुआ है। गाँव की तो क्या, तुझे घर की भी फिकर नहीं। तुझे तब अकल आएगी जब चेअरमैन सरपंचनी को शहर वाली कोठी में रख लेगा।'' मुझे लगा, ठीकठाक खड़े को अचानक पीछे से किसी ने पीट डाला हो।
''जा, भैण का यार कुत्ता।'' जब मैंने कहा, वह दूर निकल चुका था।

मुख्तियारो को शहर वाली कोठी में रखने वाली उसकी बात मुझे डसे जा रही थी। नहीं, चेअरमैन ऐसा नहीं कर सकता। न ही मुख्तियारो ऐसा कर सकती है। पर 'चार बच्चों की माँ प्रेमी के साथ फरार' वाली खबर भी तो पी.टी. मास्टर ने सवेरे सुनाई थी, जो पंचायतों को अधिक अधिकार वाली ख़बर के नीचे दबकर रह गयी थी। घर लौटा तो दरवाजे बन्द। ज़रूर मुख्तियारो थाणे गई होगी- भैण देने चेअरमैन के साथ। बच्चे भैंस के लिए चारा लेने गए होंगे। मुझे मुख्तियारो पर गुस्सा आने लगा। अब उसे मुझ अपाहिज से क्या लेना। जब से टांगों से मुहताज हुआ हूँ, कुत्ती औरत को पंख लग गए। बिलांद भर लम्बी ज़बान लग गयी। पहले साली के मुँह से रोने के सिवा कोई आवाज़ नहीं निकलती थी। उसका फ़र्ज़ नहीं बनता था कि अपने खसम से पूछकर जाती। मैं मछली की भांति छटपटाने लगा। पहियों वाली कुर्सी कभी इधर, कभी उधर घूमने लगी। कहाँ से साला सरपंची का स्यापा गले में डाल लिया। पहले सुख से दो रोटी खाते थे। जात-बिरादरी भी तोड़ ली। कहते हैं- जब हम पहले खड़े थे, फिर तूने क्यों मुख्तियारो को सरपंच बनाया। चुनाव हारकर भी रुलिया ने कहा, ''कोई बात नहीं गुलजार सिंह, लोगों का फैसला सिर माथे।'' पर चेअरमैन ने दरार बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। छोटे-छोटे बच्चों से गाँव में जुलूस निकलवाया, नारे लगवाये-

जित्ती आ भई जित्ती आ,
जित्त गई मुख्तियारो।
हार गया भई हार गया,
हार गया रुलिया।
की करुगा गोहा-कूड़ा।

पहले हम भाइयों की तरह बरतते थे। दुख-सुख में आते-जाते थे। अब सभी मेरी खिल्ली उड़ाते हैं।
अंधेरा हो गया। मुख्तियारो अभी घर नहीं लौटी। मेरी पहियों वाली कुर्सी का मुँह चेअरमैन के घर की तरफ हो गया। उसके घर में बन रहे पकवानों की खुशबू मेरे दिमाग को चढ़ गयी। मेरी भूख और चमक उठी। गुस्सा फितूर बनकर दिमाग को चढ़ गया। गुस्से पर काबू करते हुए सरदारनी के आगे हाथ जोड़े, ''सरदारनी जी, मेरा टब्बर भूख से परेशान है। डंगर-पशु भूखे खड़े हैं। सरदार को फोन करो।''

अंधेरा और गहरा हो गया। मेरी पहियों वाली कुर्सी चेअरमैन के आंगन में इधर-उधर घूमे जा रही थी। क्रोध में ऑंखों के आगे अंधेरा छा रहा था। पता नहीं, किस वक्त मेरे मुँह से चेअरमैन के लिए गालियाँ निकलने लगीं। हर वक्त हँसने वाली सरदारनी लाल-पीली होकर अन्दर से निकली और बोली, ''अपनी औकात में रह।'' भइये ने 'साला चमरुआ' कहकर मेरे थप्पड़ मारे। मेरी कुर्सी घुमा दी। फिर उलटा दी। सरदारनी ने उसे रोका, ''छोड़ परे रामू, छोटे लोगों के मुँह नहीं लगा करते।'' मेरी कुर्सी भइये से ठीक करके मुझे उस पर बिठाया। शायद मेरे नाक से बहता खून देखकर उसे तरस आ गया हो। मुझे कहने लगी, ''गुलजार भाई, लोगों से लड़ने की बजाय मुख्तियारो को समझा।''

कुर्सी को धकेलता पता नहीं कैसे मैं घर पहुँचा। भूखे-प्यासे बच्चों ने शोर मचा रखा था। घर के अन्दर अंधेरा था। बिल न भरने के कारण बिजली का कनेक्शन कटा हुआ है। दीया पता नहीं कहाँ रखा है। मूर्ख औरत लौटकर वापस घर आये तो सही... आज नहीं छोड़ूंगा। साली कार का मजा लिए घूमती है !
00
जतिंदर सिंह हांस
शिक्षा- एम ए , बी एड।
प्रकाशित कृति : पावे नाल बन्निया होया काल(कहानी संग्रह)- पंजाबी में।
पाये स बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)- हिन्दी में।
संपर्क : गाँव-अलूना तोला, पोस्ट आफिस-अलूना पल्लाह,जिला-लुधियाना(पंजाब)-41414
फोन : 01628-275220, 09463352107

भाषांतर



धारावाहिक रूसी उपन्यास(किस्त-7)

हाजी मुराद
लियो तोलस्तोय
हिन्दी अनुवाद : रूपसिंह चंदेल

॥ सात ॥
घायल आवदेयेव को छावनी के निकासी द्वार के निकट के अस्पताल में, जो लकड़ी के एक छोटे-से मकान में था, ले जाया गया और जनरल वार्ड के एक खाली बेड पर लिटा दिया गया। वार्ड में चार मरीज थे। एक सन्निपात-ग्रस्त टायफायड का केस था, और दूसरा निस्तेज, ज्वरग्रस्त, धंसी हुई आँखें, सदैव मरोड़ उठने की आशंका से ग्रस्त और लगातार जम्हुआई लेनेवाला मरीज था । दो और थे जो तीन सप्ताह पहले हुए हमले में घायल हुए थे। एक, जो खड़ा हुआ था, हाथ में और दूसरा; जो बिस्तर पर बैठा हुआ था, कंधे में घायल था। टायफायड वाले मरीज को छोडकर शेष ने नवागन्तुक को घेर लिया और उसे लेकर आने वालों से प्रश्न करने लगे।
'' वे लोग कभी-कभी धुंआधार गोलीबारी करते हैं, लेकिन इस बार उन्होंनें केवल आधा दर्जन बार ही फायर की थी,''- लेकर आने वालों में से एक ने उन्हें बताया ।
''भाग्य की बात है।''
''ओह।'' आवदेयेव दर्द को रोकने का प्रयास करता हुआ कराहा, जब वे उसे बिस्तर पर लेटा रहे थे। जब उन्होनें उसे लेटा दिया, उसने त्योरियाँ चढ़ाई और कराहना बंद कर दिया, लेकिन पैर के कारण बेचैनी अनुभव करता रहा। उसने घाव को अपने हाथों से पकड़ लिया और एकटक अपने सामने की ओर देखने लगा। डाक्टर आया और उन्हें आदेश दिया कि उसे औंधा पलट दें यह देखने के लिए कि क्या गोली पीछे से बाहर निकल गयी थी।
''यह क्या है ?'' डाक्टर ने पीठ और नितम्बों पर बने क्रास के लंबे सफेद निशान की ओर संकेत करते हुए पूछा।
''सर, पुराने घाव का निशान है !'' कराहते हुए आवदेयेव बुदबुदाया।
उसने धन का अपव्यव किया था। उसके लिए उसे जो दण्ड दिया गया था, यह उसीका निशान था।
उन्होंने उसे पुन: पलट दिया, और डाक्टर ने सलाई से उसके पेट में गहराई तक टटोला और गोली तक पहुँच गया, लेकिन उसे निकाल नहीं सका। उसने घाव की ड्रेसिंग की और चिपकनेवाला प्लास्टर चढ़ाया, फिर चला गया। पूरे परीक्षण और घाव की ड्रेसिंग के समय आवदेयेव दांत भींचे और आँखें बंद किये लेटा रहा था। जब डाक्टर चला गया उसने आँखें खोलीं और विस्मय से चारों ओर देखा। उसकी आँखें मरीजों और अर्दली की ओर घूमीं, फिर भी उसे लगा कि वह उन्हें नहीं देख रहा है, बल्कि विस्मित कर देने वाला कुछ और ही देख रहा है।
आवदेयेव के साथी पानोव और सेरेगिन आए हुए थे। वह अचम्भित-सा उन्हें टकटकी लगाकर देखता हुआ, उसी प्रकार लेटा रहा। देर तक वह अपने मित्रों को पहचान नहीं पाया, हालांकि उसकी आँखें सीधे उन्हें ही देख रही थीं।
''पीट, क्या तुम घर से कुछ मंगाना चाहते हो ?'' पानोव ने पूछा।
आवदेयेव ने कोई उत्तर नहीं दिया, हालांकि वह पानोव के चेहरे की ओर ही देख रहा था।
'' मै पूंछ रहा हूँ, तुम घर से कुछ मंगाना चाहते हो ?'' उसके ठण्डे हाथ को स्पर्श करते हुए पानोव पुन: बोला।
आवदेयेव को चेतना वापस लौटती हुई-सी प्रतीत हुई।
''हैलो, अन्तोनिच।''
''हाँ, मैं आ गया। तुम घर से कुछ मंगाना चाहते हो ? सेरेगिन लिख देगा।''
''सेरेगिन,'' कठिनाई से अपनी आँखें सेरेगिन की ओर घुमाते हुए आवदेयेव बोला, ''क्या तुम लिख दोगे ? तब उन्हें यह लिखो - आपका बेटा पीटर मर गया । मुझे अपने भाई से ईर्ष्या थी - यही बात पिछली रात मैं कह रहा था … लेकिन अब मैं प्रसन्न हूँ। ईश्वर उसे सौभाग्यशाली करे। मैं उसकी खुशकिस्मती की कामना करता हूँ। मैं प्रसन्न हूँ। ऐसा ही कुछ लिख दो।”
जब वह यह सब कह चुका, उसने पानोव पर एकटक दृष्टि गड़ायी और लंबी चुप्पी साध ली।
पानोव ने कोई उत्तर नहीं दिया।
''तुम्हारा पाईप, तुम्हारा पाईप, मैं कहता हँ, वह तुम्हें मिल गया ?'' आवदेयेव ने पूछा।
''वह मेरे सामान में था।''
''अच्छा, अच्छा। अब मुझे एक मोमबत्ती दो। मैं मरने वाला हूँ।'' आवदेयेव बोला।
उसी समय पोल्तोरत्स्की उसे देखने आया।
''तुम कैसा अनुभव कर रहे हो … खराब ?'' वह बोला।
आवदेयेव ने आँखें बंद कर लीं और सिर हिलाया। उसका दुबला चेहरा निष्प्रभ और कठोर था। उसने उत्तर नहीं दिया, लेकिन पानोव से पुन: बोला:
''मुझे मोमबत्ती दो, मैं मरने वाला हूँ।''
उन्होने एक मोमबत्ती उसके हाथ में रख दी, लेकिन यह सोचकर कि उसकी उंगलियाँ उसे पकड़ नहीं पायेगीं, उन्होंने मोमबत्ती उसकी उंगलियों के बीच में रखा और उसे थामे रहे। पोल्तोरत्स्की कमरे से बाहर चला गया और उसके जाने के पाँच मिनट बाद अर्दली ने आवदेयेव के हृदय के पास कान लगाया और कहा कि वह मर गया।
तिफ्लिस को जो रिपोर्ट भेजी गई उसमें आवदेयेव की मृत्यु का विवरण इस प्रकार दिया गया था- ''23 नवम्बर को कुरियन बटालियन की दो कम्पनियाँ जंगल साफ करने के लिए छावनी से गयी थीं। वृक्ष काटने वालों पर आक्रमण कर दिया। अग्रिम चौकी पर तैनात दलों ने वापस लौटना प्रारंभ कर दिया, जब कि दूसरी कम्पनी ने संगीनों से धावा बोल दिया और कबीलाइयों को खदेड़ दिया। युद्ध के दौरान हमारे दो सिपाही सामान्य रूप से घायल हुए थे और एक की मृत्यु हो गयी थी। कबीलाइयों के लगभग सौ लोग हताहत हुए थे।''
00
(क्रमश: जारी…)

अनुवादक संपर्क:
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दूरभाष : 011-22965341
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Thursday, October 16, 2008

साहित्य सृजन – सितंबर-अक्तूबर 2008


‘मेरी बात’ के अन्तर्गत इस बार प्रस्तुत है - हिंदी की प्रख्यात कथाकार सुधा अरोड़ा द्वारा हिंदी के वरिष्ठ लेखक और ‘हंस’ के सम्पादक राजेन्द्र यादव के नाम लिखा गया एक खुला पत्र जो हिंदी कथा मासिक ‘कथादेश’ के अगस्त 2008 अंक में ‘औरत की दुनिया’ स्तंभ के अन्तर्गत प्रकाशित हुआ है। इस पत्र को सुधा जी ने ‘साहित्य सृजन’ में विशेष रूप से पुनर्प्रकाशन के लिए प्रेषित किया है। अपने इस पत्र के साथ उन्होंने प्रभुजोशी का आलेख ‘स्त्री देह का बाजार और स्त्री की जय-पराजय’ भी प्रेषित किया था लेकिन स्थानाभाव के कारण हम उसका प्रकाशन नहीं कर रहे पा रहे हैं। इस पत्रनुमा आलेख के बहाने सुधा जी ने स्त्री विमर्श को लेकर जो प्रश्न उठाये हैं, वे न केवल विचारणीय हैं, बल्कि एक बुनियादी बहस की भी मांग करते हैं।

‘हंस’ के सम्पादक राजेन्द्र यादव के नाम एक खुला पत्र

स्त्री-विमर्श के नाम पर कृपया साहित्य में प्रदूषण न फैलायें
-सुधा अरोड़ा


‘हंस’ के जून अंक का सम्पादकीय ‘एक और स्त्री विमर्श पढ़कर एक घटना याद आ गयी।
फतेहपुर सीकरी के राजमहल में गाइड बड़े उत्साह से एक जगह का ब्यौरा देते हैं, जहाँ एके विशालकाय चौपड़ का चार खाने वाला ढाँचा है। उससे कुछ ऊपर राजा-महाराजाओं के बैठने की जगह बनी है, जहाँ से राजा चौपड़ खेलते हुए चाल का पासा फेंकते थे। हरी, पीली, लाल, नीली गोटियों की जगह हरे पीले लाल नीले रंग के वस्त्रों, आभूषणों से सजी कन्याएँ खड़ी रहती थीं और पासे को फेंककर अगर चार नम्बर आया तो उस रंग की गोटी के स्थान पर उस रंग के वस्त्रों से सजी सुसज्जित कन्या पैरों में झांझर पहने झँकारती इठलाती हुई नृत्य के अन्दाज में चार घर चलती थीं। जाहिर है, जिन नर्तकियों या कन्याओं को गोटियों का स्थानापन्न बनाने के लिए बुलाया जाता, वे राजा के महल में प्रवेश पाने को अपना अहोभाग्य समझतीं। ‘हंस’ के पन्नों पर जब भी देहवादी सामग्री परोसी जाती है, मुझे राजा इन्द्र का दरबार सजा दिखाई देता है, जहाँ अप्सराओं(!) को रिझाने लुभाने और उनके करतब देखने के लिए राजा इन्द्र बाकायदा ‘हंस’ की शतरंजी चौपड़ का पासा फेंक रहे हैं।

आज बाजार ने तो स्त्री को देह तक रिड्यूस कर ही दिया है। स्त्री की अहमियत क्या है ? महज एक देह! इस देह का करतब हम छोटे-बड़े परदे पर हर वक्त देख रहे हैं। स्त्री की देह, सबसे बड़ी बिकाऊ कमोडिटी बनकर हमारे घर में घुस आयी है और हम उसे रोक नहीं पा रहे। लड़कियाँ यह कहने में शर्मिन्दगी महसूस नहीं करतीं कि आपके पास बुद्धि है, आप पढ़ाकर पैसा कमा रहे हैं, हमारे पास देह है, हम उससे पैसा कमा रही हैं और हमें फर्क नहीं पड़ता तो आप क्यों परेशान हैं ? हम या आप ऐसी औरतों की देह की आजादी में कहाँ आड़े रहे हैं ? देह उनकी, वे जैसे चाहें इस्तेमाल करें। पर छोटे-बड़े परदे पर अर्द्धनग्न औरतों की जमात को सामूहिक रूप से भोंडे प्रदर्शन करते देखना मानसिक चेतना पर लगातार प्रहार करता है। मीडिया और फिल्मों और विज्ञापनों में जिस तरह औरत की देह को परोसा जा रहा है, ‘जनचेतना के प्रगतिशील कथा मासिक’ को उस दिखाऊ उघाड़ू प्रवृत्ति के विरोध में खड़ा होना चाहिए। आप जैसे विचारवान सम्पादक का ‘एक और स्त्री विमर्श’ तो मीडिया और बाजार के समर्थन में खड़ा, उसकी पीठ थपथपाता ही नहीं, जीभ लपलपाता दिखाई दे रहा है।
हंस का जून अंक आया और अचानक स्त्री विमर्श पर छायी धुन्ध को लेकर पटना से निकलने वाली ‘साहिती सारिका’ के सम्पादक सलिल सुधाकर और ‘अक्सर’ के वरिष्ठ सम्पादक हेतु भारद्वाज ने स्त्री विमर्श के स्वरूप से चिन्तित होकर परिचर्चाएँ आयोजित करने का निर्णय लिया। स्त्री विमर्श को लेकर न पश्चिम में कहीं कोई धुन्ध है, न भारत में। भारत में इस धुन्ध के प्रणेता आप बन रहे हैं और इस मुगालते में जी रहे हैं कि सदियों से दबी कुचली स्त्री देह को आजाद करेंगे तो एकमात्र आप ही। जो काम फिल्मों में महेश भट्ट, मीडिया में स्त्री के साथ बाजार कर रहा है और जिसे स्त्रियों की एक खास जमात स्वयं सहमति देकर अपने आप को परोस रही है, वही काम साहित्य में एक जिम्मेदार कथा मासिक का सम्पादक कर रहा है- लोलुपता और लम्पटता को बौद्धिक शब्दजाल में लपेटकर सामाजिक मान्यता प्रदान करना।
स्त्री देह को लेकर गालियाँ, अश्लीलता, छिछोरापन कब किस समाज में, किस युग में नहीं रहा ? साहित्य में वह गुलशन नन्दा की सीधी सपाट शब्दावली के दायरे से निकलकर आपके बौद्धिक आतंक का जामा पहनी हुई भाषा में आ गया है। दिक्कत यह है कि रचनात्मक साहित्यकार समाजविज्ञान से सम्बन्धित विषयों पर शोध किये बिना और सामाजिक मनोविज्ञान की बारीकियों को समझे बगैर सामाजिक स्थापनाओं के रूप में अपनी मौलिक उद्भावनाएँ दे रहा है। निजी व्याधि को साहित्यिक रूप से प्रतिष्ठित कर आप उसे समुदाय की व्याधि बनाना चाह रहे हैं।
पश्चिम में पूँजी के आधिक्य से और भारत में पूँजी के अभाव में आजादी और आधुनिकता आयी है। निम्न मध्यवर्गीय लड़कियों की माँगें और महत्वकांक्षाएँ पूरी नहीं होतीं तो वह देह के बाजार से अपने लिए सुविधाएँ जुटा लेती हैं। शिकागो या न्यू्यॉर्क में चालीस डिग्री के ऊपर गर्मी पड़ती है तो लड़कियाँ ब्रॉ और शॉट्र्स में मॉल में घूमती दिखाई देती हैं। समुद्र या झील के किनारे उनका टॉपलेस में भी नज़र आना हैरानी का बायस नहीं बनता। वहाँ के बाशिन्दों को इसकी आदत हो चुकी है और वहाँ कोई ठिठककर उघड़ी हुई स्त्री देह को देखता तक नहीं। वहाँ की नैतिकता कपड़ों के आवरण से बारह निकल आयी है। भारत के बाशिन्दे अब भी नेक लाइन पर आँखें गड़ा देते हैं और जीन्स से बाहर झाँकती पैंटी के ब्रांड का लेबल पढ़ना नहीं भूलते। नैतिकता का हथियार वहीं वार करता है, जहाँ आज भी स्त्री देह को सौन्दर्य का प्रतीक और सम्मान की चीज़ माना जाता है। उसका भोंडा प्रदर्शन हमें विचलित ही करता है।
स्त्री को ‘अदर दैन बॉडी’ डिस्कवर करने का स्टैमिना ही नहीं रह गया है- न फिल्म निर्माताओं निर्देशकों में, न आप जैसे सम्पादकों में। अफसोस स्नोवावार्नो की कहानी ‘मेरा अज्ञात मुझे पुकारता है’ को छापने के बाद भी आप स्त्री देह के सौन्दर्य को उसकी सम्पूर्णता में न देखकर ‘निचले हिस्से का सच’ जैसी स्थूल शब्दावली में ही देखना चाहते हैं। यह दृष्टि दोष लाइलाज है।
महिला रचनाकारों की इतनी बड़ी जमात लिख रही है अपनी समस्याओं पर। उन्हें अपनी समस्याओं के बारे में खुद बात करने दीजिए। महिलाओं की बेशुमार अन्तहीन सामाजिक समस्याएँ हैं। बेहद प्रतिकूल सामाजिक स्थितियों में, दहेज प्रताड़ना, भ्रूण हत्या और गर्भपात को झेलती, खेती मजदूरी में पसीना बहाती, घर-परिवार की आड़ी तिरछी जिम्मेदारियों को सम्भालनें और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद पति की लम्पटता, उपेक्षा या हिंसा को झेलती औरत (आपसे बेहतर कौन इस स्थिति को समझ सकता है) का एक बहुत बड़ा वर्ग है जहाँ देह की आजादी या देह मुक्ति कोई मायने नहीं रखती। आज की औरत को घर के अलावा बाहरी स्पेस से जूझना पड़ रहा है तो सोलहवीं सदी का ‘ओथेलो’ भी पुरुष के भीतर फन फैलाये जिन्दा है। बलात्कार और भ्रूण हत्यायें पहले से कई गुना बढ़ गयी हैं। ताजा रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में लिंग अनुपात एक हजार लड़कों के पीछे तीन सौ लड़कियों का रह गया है (द टेलीग्राफ: लंदन 22 जून 2008 -अमित राय) पर वह ‘हंस’ के सरोकार का मुद्दा नहीं है।
‘स्त्री मुक्ति का पहला चरण देह-मुक्ति से ही शुरू होगा’ का झंडा लिए आप अरसे से घूम रहे हैं। ऐसा नहीं कि आप इसमें कामयाब नहीं हुए हैं। आजाद देह वाली स्त्रियों की तादाद में खासी बढ़ोत्तरी हुई है। हर शहर में वे पनप रही हैं। पहले सिर्फ मीडिया और कॉरपोरेट जगत में ये स्त्रियाँ अपनी देह के बूते पर फिल्मों और मॉडलिंग में जगह पाती थीं या कार्यालयों में प्रमोशन पर प्रमोशन पा जाती थीं। ‘हंस’ के स्त्री देह मुक्ति अभियान से आन्दोलित हो वे साहित्य के क्षेत्र में भी देह का तांडव अपनी रचनाओं में दिखा रही हैं और देह को सीढ़ी बनाकर राजेन्द्र यादव जैसे भ्रमित सम्पादकों का भावनात्मक दोहन कर अपनी लोकप्रियता के गुब्बारे आसमान में छोड़ रही हैं। अपने इस अश्वमेघ यज्ञ में आप सहभागी बना रहे हैं- रमणिका गुप्ता और कृष्णा अग्निहोत्री को जिनकी आत्मकथाओं को साहित्य में किन कारणों से तवज्जोह दी गयी, यह किसी शोध का विषय नहीं है।
आपके अनुसार योनि शब्द अश्लील और आपत्तिजनक है क्यों ‘योनि अकेली ही किसी एटम बम से कम है’। योनि शब्द से किसी भी स्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्ति को परहेज नहीं हो सकता। परहेज तब होता है जब उसे प्रस्तुत करने के नजरिये में खोट दिखाई देता है। ‘हंस’ के जुलाई अंक में ही फरीदाबाद के डॉ. रामवीर ने इस पर सटीक टिप्पणी कर दी है।
कृपया प्रेमचन्द की पत्रिका 'हंस' के साथ 'जनचेतना के प्रगतिशील कथा मासिक’ की स्लोगन लाइन हटाकर ‘स्त्री देह की आजादी का मुखपत्र’ रख दें। पचास साल बाद राजेन्द्र यादव के साहित्यिक अवदान को कितना याद रखा जायेगा, इसकी गारन्टी कोई नहीं दे सकता, पर ‘स्त्री मुक्ति का पहला चरण देह मुक्ति से शुरू होगा’ की उद्घोषणा के प्रथम प्रवक्ता और प्रणेता के रूप में ‘हंस’ सम्पादक का नाम अवश्य स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया जाएगा।

मैं चाहती हूँ कि इस बहाने एक बुनियादी जिरह शुरू हो जिसमें स्त्री को केवल बुर्जुआ समाजशास्त्र और बाजार के देहशास्त्र के बीच रखकर ही न देखा जाए बल्कि उसकी मुक्ति के प्रश्नों को अधिक समग्रता में खाजा जा सके क्योंकि ये प्रश्न अन्ततः हमें उस दिशा की ओर ले जाते हैं कि कौन सा और कैसा समाज गढ़ना चाहते हैं। आज बाजार की सबसे बड़ी शिकार औरत ही हो रही है और वही सबसे ज्यादा दलित है और अपमानित भी। क्या हम बाजार के यूटोपिया से ही संचालित रहेंगे या इसे लाँघ कर आगे भी जाएंगे ?
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जन्म - ४ अक्टूबर १९४६ को लाहौर (पश्चिमी पाकिस्तान) में
शिक्षा - कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में १९६७ में एम.ए. , बी.ए. (ऑनर्स) दोनों बार प्रथम श्रेणी में प्रथम।
कार्यक्षेत्र - कलकत्ता के जोगमाया देवी कॉलेज तथा श्री शिक्षायतन कॉलेज - दो डिग्री कॉलेजों के हिंदी विभाग में '६९ से '७१ तक अध्यापन। १९९३ से महिला संगठनों के सामाजिक कार्यों से जुड़ाव। कई कार्यशालाओं में भागीदारी।
लेखन - पहली कहानी 'मरी हुई चीज़' सितंबर १९६५ में 'ज्ञानोदय' में प्रकाशित, कहानियाँ लगभग सभी भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेज़ी, फ्रेंच, और पोलिश भाषाओं में अनूदित। डॉ. दागमार मारकोवा द्वारा चेक भाषा में तथा डॉ. कोकी नागा द्वारा जापानी भाषा में कुछ कहानियाँ अनूदित। 'युद्धविराम', 'दहलीज़ पर संवाद' तथा 'इतिहास दोहराता है' पर दूरदर्शन द्वारा लघु फ़िल्में निर्मित, दूरदर्शन के 'समांतर' कार्यक्रम के लिए कुछ लघु फ़िल्मों का निर्माण फिल्म पटकथाओं, टीवी धारावाहिक और रेडियो नाटकों का लेखन।
प्रकाशन - कहानी संग्रह 'बतौर तराशे हुए' (१९६७) 'युद्धविराम' (१९७७) तथा 'महानगर की मैथिली' (१९८७)। 'युद्धविराम' उत्तर-प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा १९७८ में विशेष पुरस्कार से सम्मानित।
संपादन - कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की पत्रिका 'प्रक्रिया' का सन १९६६-६७ में संपादन। बंबई से सन १९७७-७८ में हिंदी साहित्य मासिक 'कथायात्रा' के संपादन विभाग में कार्यरत। निम्न मध्यम-वर्गीय महिलाओं के लिए 'अंतरंग संगिनी' के दो महत्वपूर्ण विशेषांकों 'औरत की कहानी : शृंखला एक तथा दो' का संपादन।स्तंभ लेखन - कहानियों के साथ-साथ '७७-७८ में पाक्षिक 'सारिका' के लोकप्रिय स्तंभ 'आम आदमी : ज़िंदा सवाल' का लेखन। '९६-९७ में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर 'जनसत्ता' के साप्ताहिक स्तंभ 'वामा' का लगभग एक वर्ष तक लेखन। महिलाओं की समस्याओं पर कई आलेख प्रकाशित। स्त्री विमर्श से संबंधित लेखों का संकलन। दो कहानी संग्रह तथा एक एकांकी संग्रह शीघ्र प्रकाश्य।
संप्रति - भारतीय भाषाओं के प्रकाशन 'वसुंधरा' की मानद निदेशक। संपर्क
: sudhaarora@gmail.com

कहानी

अम्मा का पिटारा
तरुण भटनागर

‘अम्मा। ऐसे रोज-रोज कब तक टूटे-फटे जाल में गठान बांधती रहोगी ?’
वह रोज की तरह अम्मा के पास आकर बैठ गई।
लोग उसे ‘अम्मा’ कहते हैं। वह भी खुद को ‘अम्मा’ ही जानती है। उसे अपना असली नाम याद करने पर ही याद आता है। जुबान पर ‘अम्मा’ ही रहता है।जब वह यहां आयी थी, तब मछुआरा बस्ती के लोगों के लिए वह अनाम थी। लोग उसे अम्मा कहने लगे। उसका नया नाम हो गया। फिर अड़सठ साल की बुढ़िया को कोई और क्या कहेगा? ‘अम्मा’ ही तो कहेंगे। वह भी मानती है वह अम्मा ही है।
सूरज ऊपर चढ़ आया है। रात का ज्वार का पानी उतर चुका है। किनारे वाला मटमैला समुद्र दूर के नीले समुद्र से बिल्कुल अलग दिख रहा है। समुद्र की धीमी और छोटी लहरें दूर तक फैली रेत पर अपना फेन पटक रही हैं। हर सुबह जब ज्वार का पानी उतरता है, तब बहुत सी मछलियां समुद्र के किनारे तक आ जाती है। पहले वह सोचती थी कि सुबह ही मछली मारा करे। मछुआरा बस्ती के जवान मछुआरे जब सुबह अपनी डोंगियां समुद्र में उतारते हैं, तब उसका भी उनके साथ मछली मारने जाने का मन करता है। पर बरसों पहले से उसने सुबह मछली मारना बंद कर दिया है। बरसों पहले जब वह जवान थी, तब मछलियां बडी आसानी से मिल जाया करती थीं। उन दिनों समुद्र में ढेरों मछलियां होती थीं। एक बार डोंगी से समुद्र में उतर जाओ और गहरे पानी में जाल बिछा दो और फिर बस थोड़ी ही देर बाद- हां थोड़ी ही देर बाद उस जाल को डोंगी में खींच लो। इतनी मछलियां निकलतीं कि डोंगी के पेंदे पर पैर रखने को जगह नहीं बचती। पूरी डोंगी में चमकती, उछलती, फडफडाती हजारों मछलियां भर जातीं। उन दिनों एक बार मछली पकडने के बाद हफ्तों तक जाल डालने की झंझट नहीं होती थी। कितने सुख भरे दिन थे। अब तो मछलियां कम हो गई हैं। फिर भी कुछ नही होता । अम्मा को लगता कुछ नहीं होता। भला क्या किया जा सकता है? कुछ नहीं। फिर यह समुद्र इतना तो दे ही देता है, कि वह सुकून से अपना घर चला सके। घर भी क्या, वह तो अकेली है। बरसों हो गये, वह अकेली है। किसी के साथ होने का अहसास अब मर गया है। लगता ही नहीं कि अकेले होने में कुछ अजीब है। अम्मा के लिए अकेले रहना रोज के माछी-भात की तरह है। रोज की एक सी बात। कुछ भी अजीब नहीं।
बुढ़ापा और अकेलापन दोनों एक साथ हैं। पर अम्मा इन दोनों को चिढ़ाती रहती है। बुढ़ापा है तो अब आँख जवाब दे गई है, पैर लडखडाते हैं, गर्दन हल्की-हल्की कांपती है, ऊंचा सुनाई देता है और हर दूसरे दिन कमर और पीठ दुखती है। पर वह है कि शाम को समुद्र किनारे जायेगी ही। भले कोई काम ना हो पर रात के अंधेरों में भटकेगी। ताड़ और सुपारी के ऊंचे पेड़ों वाले जंगल में रात को भटकेगी। पकी सुपारी की गिरी बटोरेगी। ताड़ के सूखे पत्ते खींचेगी और अपनी झोंपड़ी की खराब छानी पर उस पत्ते को फंसाकर-दबाकर छानी ठीक करेगी। ताड़ी के सब पेडों पर देख आयेगी कि मटकी ठीक बंधी है या नहीं, कहीं टपक तो नहीं रही। एक बूंद ताड़ी टपकी नहीं कि उसको पता चला। समुद्र किनारे रात को सूखा फेन बटोरेगी… सब कुछ रात को ही करेगी। उसकी आँख बहुत कमजोर हो गई है। पर वह मानती ही नही है। मछुआरा बस्ती के लोगों ने बहुत समझाया- यूं रात को मत भटका कर अम्मा....ताड़ और नारियल के जंगल में तो बिल्कुल मत भटकना… पर अम्मा टस से मस नहीं हुई। उसको लगता,बुढ़ापे में तो ऐसा होता ही है। वह कौन अनोखी ठहरी, जो अड़सठ साल में उसका शरीर ना बिगड़े। कौन बुड्ढा है जिसका शरीर नहीं बिगड़ता। पर इससे काम तो नहीं रुकना चाहिए। वह तो रूक ही नहीं सकती। इतने काम पडे हों तो वह कैसे रुक जाये ? अगर वह अंधी हो जाये तब भी वह रात को समुद्र किनारे और ताड़ के जंगलों में जायेगी। मछुआरा बस्ती के लोग कहते हैं कि मत जा … किसी दिन धोखा हो जायेगा। कभी गिर पड़ी या समुद्र की लहरों ने खीच लिया तो… पर वह क्या करे ? उसके काम जो हैं। कभी निबटते ही नहीं। फिर ऐसी भी क्या मजबूरी कि शरीर खराब हो रहा है। मछुआरा बस्ती वाले किसी एक ऐसे बुड्ढे को ढूंढ के ला दें जो उसकी उमर का हो और उसका शरीर ठीक-ठाक हो। बस्ती के लोगों का तो बस यही है कि अम्मा बैठी रहे। सारा दिन सारा रात बैठी रहे। ऊपर से यह और कहेंगे कि अम्मा का भला कौन है। कोई भी तो नहीं है, उसके साथ। बेचारी अम्मा…। कितना अकेली है। ठीक है उससे उनकी कोई रिश्तेदारी नहीं, पर वे अम्मा को खाने को तो दे ही सकते हैं। इस इलाके के समुद्र में इतनी मछलियां होती हैं, कि कोई भूखे ना मरे। फिर वह कितना खायेगी… मुठठी भर भात और थोड़ी-सी मछली। यह तो कोई भी दे सकता है। उसको तो काम करना छोड़ देना चाहिए। इतनी बडी मछुआरा बस्ती है। फिर अम्मा के सब पर उपकार हैं। किसी के घर जचकी हो, लडकी बिगड़ जाये, शादी ब्याह के तौर तरीके हों, किसी की तबीयत खराब हो… अम्मा हर जगह मिल जायेगी। उसने किसका साथ नहीं दिया भला। हर किसी पर अम्मा का उपकार है। पूरी मछुआरा बस्ती पर अम्मा का बड़ा उपकार रहा है। भला लोग उसे दो जून को माछी-भात नहीं दे सकते। सब देंगे... हां सब। कोई नहीं कह ही नहीं सकता। पर अम्मा…। वह किसी की नहीं सुनती। जो लोग उसे कुछ खाने का लाकर देना चाहते, वह उन्हें कोई तवज्जो नहीं देती। ऐसा नहीं था कि वह लोगों को भगा देती हो। अगर कोई उसको कुछ दे जाता तो वह उसे रख लेती...पर अगले ही दो-चार दिनों में उसका हिसाब बराबर कर देती। अभी दो रोज पहले बस्ती का एक मछुआरा अम्मा को चावल दे गया। अम्मा ने रख लिया, पर अगले ही दिन वह उसके घर गई और उसे दो बड़ी मछलियां दे आई और उसे यह भी कह आई कि हिसाब बराबर हो गया। अम्मा की ऐसी हरकत के कारण लोग उसे फिर कुछ नहीं देते। जो देते अम्मा उसका हिसाब बराबर कर देती। कुछ लोग बुरा मान जाते। लोग तो इसलिए देते, क्योंकि उन्हें अम्मा को देना अच्छा लगता। वर्ना आज के समय में कहां कोई किसी की मदद करता है। पर अम्मा को अजीब फितूर सवार रहता कि लोग उसे नकारा बनाने में लगे हैं। वह जब जवान थी तब ऐसी नहीं थी और ना इस तरह करती थी। तब वह दूसरी मछुआरा बस्ती में रहती थी।.... पर इस बुढापे में उसको ना जाने क्या हो गया है। कुछ लोग कहते वह सठिया गई है,तो कुछ कहते उसको गुरूर है। पर अम्मा का अपना ही जवाब है। भला वह क्यों किसी से ले। वह पूरी मछुआरों की बस्ती में सबसे बड़ी है। कोई उससे बड़ा नहीं है। फिर तो लोगों को उससे लेना चाहिए। ना कि उसको देना चाहिए। लोग कहते- अम्मा बुढि़या हो गई है। हाथ-पैर नहीं चलते हैं। आँख से दिखना भी कम हो गया है। बुढ़ापे की कमजोरी आ गई है। ऐसे में मुट्ठी भर चावल और मछली के लिए दिन रात भटकना ठीक नहीं है। कहीं कुछ हो गया तो। जब लोग ऐसा कहते, तो अम्मा नाराज हो जाती। कहतीं - बताओ भला किस बुड्ढ़े का शरीर कमजोर नहीं होता। उन्हें किसी की दया की जरूरत नहीं। जब शरीर को कुछ हुआ ही नही है, तब काहे की दया। वह लोगों से चिढ़ जाती…हुंह...कहीं कुछ हो जायेगा… जिनके शरीर ठीक हैं, आँख ठीक है, उनके साथ नहीं होता है क्या?… पास की मछुआरा बस्ती का किस्सा ही लो। जवान लड़का मछली पकड़ने गया। फिर तेज हवा और बरसात हुई। वह समुद्र से वापस नहीं लौटा। कहीं कुछ हो गया तो … हुंह… सब नाटकबाज हैं…बस मेरे को नकारा बनाने का सोचते हैं। जलते हैं कि इतने बुढ़ापे में भी कैसे चल फिर रही हूं मैं। अरे खुश हूँ…अकेले होने के बाद भी कभी दुःखी नहीं होती है-अम्मा… पुरी बस्ती में अम्मा के कारण रौनक है… मुहल्ले के बच्चे सबसे ज्यादा अम्मा से ही हिले हैं। इसी वजह से सब चिढ़ते हैं। कहते हैं, हाथ पैर काम नही करते… हुंह… देखना अभी सौ साल और चलेगी ये बुढि़या… सुन लो। मरते दम तक भिड़ी रहेगी अम्मा। सबको दे के ही जायेगी। तुम क्या दोगे मुझे ? सब मेरे से छोटे हो। मेरे बच्चे होते तो तुम्हारे जितने ही होते। बड़े देने वाले बने हैं। अरे अम्मा तो देती ही है और तुम सब लेते हो। इतना भी नहीं समझते।… वह बस्ती वालों पर झुंझला जाती। फिर बस्ती वालों को उसे उसके हाल पर छोड़ना ही पड़ता। वरना अम्मा उन्हें नहीं छोड़ती। पूरी मछुआरा बस्ती में बताती फिरेगी कि फलां-फलां आया था मेरे को भीख देने ? हर आदमी से कहेगी आया था, मुझ पर दया दिखाने… मैंने तो कह दिया अपनी मां को दे दे। वही है सबसे बड़ी भिखारन। और फिर खिलखिलाकर हंस पड़ती वह। उसके पोपले झुर्रीदार मुंह में सामने के दो लटके हुए दांत दिख जाते।
अम्मा अकेले रहने से ना तो डरती है और ना ही दुःखी होती है। डर काहे का। उस पर क्या धरा है जो कोई डराकर उससे ले जाये- हिण्डालियम की एक दचकी - पिचकी पतीली, एक एल्यूमिनियम की प्लेट, दो-एक कटोरी, दो चार मटके, सरकारी जमीन पर बनी एक कच्ची झोंपड़ी, झोंपड़े पर छाये ताड़ के पत्तों की छानी, एक टूटी बान वाली खटिया, एक बहुत पुरानी दरी, एक चादर, गिनती के पहनने के कपड़े, लोहे का पुराना बक्सा, मछली पकड़ने का कटा-फटा सा जाल, खाने पीने का थोडा सामान चावल, सूखी मछलियां, आधा शीशी कडवा तेल, नारियल की थोड़ी-सी गिरी, मुठ्ठी भर कच्ची सुपारी, आधा मटका ताड़ी और वह खुद… यह है अम्मा कि दुनिया। भला किसी को इसमें से किसी चीज की क्या जरूरत। फिर उसे यह भी डर नहीं कि कोई आदमी उसे पकड़ लेगा। अड़सठ साल की बुढिया को कौन पकड़ेगा। वरना इस मछुआरा बस्ती में तो ऐसे कई किस्से हैं<। अकेली औरत को पकड़ कर उसके साथ कुछ लोग गंदा काम करते हैं। अम्मा को ऐसे लोगों पर गुस्सा आता है। जब वह जवान थी उसने दो चार ऐसे लुच्चों को ठीक किया था। पर अब वह लड़ नहीं सकती। लेकिन हां ऐसे लोगों को गाली देने और धमकाने के लिए वह हमेशा मौजूद है। बस्ती में कहीं किसी लड़की -औरत के साथ ऐसा कुछ हुआ और अम्मा वहां पहुँची और उसने लोगों की खबर ली- अगर लड़की की मर्जी नहीं है तो काहे…हरामी साले … पुलिस में रिपोर्ट करो। अम्मा गंदी गालियों की बौछार लगा देती। मछुआरा बस्ती की दूसरी औरतें उसको अवाक-सी देखतीं, आदमी और लड़के अम्मा की गालियां सुनकर हंसते…। ऐसे मामलों में अम्मा लोगों को पुलिस के पास जाने को जरूर कहती। यद्यपि पुलिस ऐसे मामलों में ज्यादा कुछ नहीं करती थी। पर वह लोगो को वहां जरूर भेजती। लोग लाज शरम के मारे और बहू बेटियों की इज्जत की खातिर पुलिस के पास जाने से कतराते। पर वह उन्हें जाने को कहती। फिर जब पुलिस का कांस्टेबल तफ्तीश के लिए बस्ती आता, तो अम्मा उसे पूरी कहानी विस्तार से बताती। ऐसी-ऐसी बातें भी बताती जिसे कहते हुए दूसरे लोग लजा जायें। पर वह कहती। लड़की के घर वाले उसको कई बातें कहने से रोकते। जब वे रोकते तो वह उनको डांटती। फिर समझातीं। अम्मा को उम्मीद रहती कि पुलिस कुछ करेगी। पर अक्सर कुछ नहीं होता। फिर लोग अम्मा को कोसते। कहते उसने बेइज्जती करा दी। पुलिस में जाने से क्या हुआ भला? रही सही इज्जत भी चली गई। मछुआरा बस्ती के लोग अम्मा से चिढ जाते और उसको सख्त हिदायत देते कि वह उनके मामले में दखल ना दे।… अम्मा उनकी बात का जवाब देती। वह कहती कि पुलिस मवालियों को ठीक करेगी। उनके जमाने में उन्होंने कुछ मावालियों की रिपोर्ट की थी, तब पुलिस ने उन्हें ठीक किया था। इन्हे भी करेगी। सरकारी काम में देर तो लगती ही है। फिर बेइज्जती काहे की। सच बात बोलने में काहे कि बेइज्जती। पर लोग नहीं मानते और सारा दोष अम्मा के सिर मढ देते। अम्मा उनसे बहस करती। पर जब उसकी कोई नहीं सुनता और सब एकसाथ हो जाते तो वह रुआंसी हो जाती। लडकी के मां-बाप और आस-पडोस के लोग हफ्तों- हफ्ते तक उससे बात नहीं करते। उसके बारे में उल्टी-सीधी बात पूरी बस्ती में करते। वह दुःखी हो जाती। फिर उसको लगता भाड़ में जायें सब लोग...। उसे क्या लेना-देना। अबकी बार वह ऐसे मामलों में दखल नहीं देगी। पर यह हो नहीं पाता। जब भी कोई झंझट बस्ती में होती, अम्मा का मन नहीं मानता और वह पहुंच जाती। अपनी बात पर वह कायम नहीं रह पाती। अम्मा उस लड़की को भी समझाती। सारे मछुआरा बस्ती की औरतें कहतीं कि अम्मा अच्छा समझाती है। वह कहती समझाना जरूरी है। फिर उसको अड़सठ साल का अनुभव जो है। वह सबसे बड़ी है। उससे अच्छा और कौन समझा सकता है। इसमें अजीब क्या है? अम्मा सबसे अच्छा समझाती है, तो वह सबसे बड़ी भी तो है। सच अम्मा को बिल्कुल डर नहीं लगता।
अम्मा को दुःख भी नहीं होता। वह बरसों से अकेली है। जब उसका आदमी जिंदा था, वह तब भी अकेली थी। जब ब्याह हुआ था, तब तो उसका आदमी ठीक था। कुछ दिन दोनों ठीक रहे। फिर उसका मन अम्मा से भर गया। उसने शहर पार वाली बस्ती की एक दूसरी औरत कर ली। फिर अम्मा के बच्चा भी नहीं हुआ। वह इस बात से भी चिढ़ता था। हफ्तों हफ्तों घर नहीं आता था। वह उसकी राह तकती। वह उसके जीवन का सबसे कठिन समय था। वह अपने जीवन में बस उसी समय दुःखी हुई थी। घर में कोई जानवर पाल लो तो उससे भी प्यार हो जाता है। वह तो उसका आदमी था। ठीक है किसी दूसरी औरत के साथ है, पर भी ऐसा क्या कि एक बार भी ना आये। उसको इस बात से ज्यादा अंतर नहीं पड़ता कि वह दूसरी औरत के साथ है। जवानी में होता है। होता है। ऐसा होता है। पर उसे एक बार आना तो था। उसके साथ वह आठ साल रही है। भला बताओ किसी के साथ आठ साल रहो। उससे प्यार नहीं होगा क्या ? पर कैसा पत्थर दिल है एक बार पलट कर नहीं देखा कि, वह मर गई कि जी रही है। छिः कैसा आदमी है। उसकी इच्छा होती, वही देख आये। फिर अक्सर वही उसे देखने जाने लगी। उस दूसरी औरत के घर वह अपने आदमी को देखने जाती थी। वह औरत अम्मा को हिकारत भरी नजर से देखती। पर वह डटी रहती। कभी-कभी उसका उस औरत से झगडा भी हो जाता। पर उसने हार नहीं मानी। फिर आदमी की तबियत खराब हो गई। वह औरत उसके आदमी को अस्पताल ले गई। पता चला दारु के कारण उसका कलेजा खराब हो गया है। अम्मा को आदमी से मिलने का पक्का बहाना मिल गया। भला बीमार आदमी को वह नहीं देखेगी। बीमार आदमी को देखने से भला कोई रोकता है? उसने आदमी की बीमारी के बहाने उस औरत के घर में खासी पैठ बना ली। उसे अपने आदमी से मिलने में पहले से कम मुश्किल होती। पर फिर धीरे-धीरे उसका जाना छूट गया। फिर एक रोज खबर आई कि वह मर गया। उसकी शादी के समय उसके गले में एक काला धागा और एक लोहे की चाबी बांधी गई थी। उसने उसे अपने गले से उतारकर रख दिया। दूसरी औरतें भी ऐसा ही करती हैं, सो उसने भी किया। फिर वह कभी दुःखी नहीं हुई। आज भी जब-तब वह आँखें बंद करती है, तो उसका आदमी उसे दिख जाता है। पर अब दुःख नहीं होता। दुःख तो दूर उसे लगता भी नहीं कि वह अकेली है।
अम्मा बरसों पहले इस मछुआरा बस्ती में आई थी। आदमी के मरने के बाद भी वह काफी समय तक पुरानी जगह में ही रही। पर फिर जैसे-जैसे वह अपने आदमी को भूलती गई, उसे वह जगह भी बेकार लगने लगी। फिर वह अपने आदमी को भूल गई और वह जगह पूरी तरह से बेकार हो गई। उसे उस बस्ती में जाने का मन किया, जहां वह अपने बचपन में रहती थी और यूं एक दिन वह इस मछुआरा बस्ती में आ गई। यद्यपि अब इस बस्ती में उसके बचपन का कुछ भी नहीं है। बापू के मरने के समय वह यहां आख़िरी बार आई थी। झोंपडा खाली हो गया था। अम्मा ने अपने आदमी की सलाह पर उसे बेच दिया। फिर वापस चली गई। बाद में पता चला मछुआरा बस्ती में तूफान आया था। भयंकर तूफान। सारे झोंपडे उड़ गये। समुद्र में गये मछुआरे वापस नहीं आये। पूरी बस्ती में पानी भर गया। बहुत से लोग मारे गये। फिर बाद में पूरी बस्ती सुनसान हो गई। ज्यादातर लोग बस्ती छोडकर चले गये। पुराने लोग या तो मर गये या चले गये। बहुत बाद फिर कुछ और मछुआरे आये और धीरे-धीरे बस्ती फिर से आबाद हो गई। कई बार अम्मा बस्ती के पुराने लोगों,बुड्ढे-बुढियों से उन पुराने लोगों के बारे में पूछती है। खासकर बचपन के किसी साथी और परिचितों के बारे में। पर उसे कोई बता नहीं पाता है। वह सोचती है, अगर उसका शरीर ठीक होता तो वह उन लोगों को तलाश जरुर करती।
शाम को पूरी मछुआरा बस्ती के बच्चे उसके झोंपड़े के सामने रेत पर खेलने आ जाते है। वह उनको देखते हुए खुश होती है। कभी कोई बच्चा अम्मा-अम्मा कहते हुए उसके पास आकर उसके शरीर से लिपट जाता है, तो उसे लगता है जैसे वह बूढ़ी नहीं है और जैसे वह और वह बच्चा मां और बेटे हैं। वह मां है, जवान मां और वह खुद उसी का बच्चा। बस ऐसा ही तो लगता होगा किसी औरत को अपने बच्चे के साथ। नयी मांयें उसकी जितनी बूढ़ी नहीं होती हैं। फिर जब उन नई मांओं के बच्चे उनसे चिपट जाते हैं, तो उस नयी मां को उसकी तरह सोचना नहीं पड़ता है, कि वह मां है और वह उसका बच्चा…। उसे उसकी तरह आंखें बंद कर खुद को झूठा यकीन नहीं दिलाना पडता है कि वही मां है… हां वही। जब वह चिपटता है, तो उस औरत की छाती में वैसी धुकधुकी नहीं होती है जो अड़सठ साल की अम्मा की छाती में आज भी होती है... बस, यही दो चार गिनती के अन्तर हैं, वरना किसी औरत को मां होने का अहसास ऐसा ही महसूस होता होगा। लोग कहते हैं, बच्चा ना हो तो औरत को दोष होता है। वह भी मानती है कि दोष है। हर औरत को कम से कम एक बच्चा तो होना ही चाहिए। पता नहीं कैसा लगता होगा ? कैसा लगता होगा खुद का बच्चा होना ? उसको नहीं मालूम। इसलिए वह मानती है कि दोष है। झोंपडे के बाहर समुद्र की रेत पर खेलते बच्चों में से जब कोई बच्चा उससे आकर चिपट जाता है या कभी किसी दूसरे के बच्चे को अपने गोद में लेकर जब वह उसे प्यार करती है, तब उसका मन मजबूती से कहता है कि, दोष है। हां दोष है। दोष ही तो है…।
जब अम्मा झोंपड़े में होती, तो पूरे मुहल्ले के बच्चे उसके चारों ओर इकठ्ठे हो जाते। जब वह अकेली होती, तो बस्ती में औरतों से बतियाने पहुंच जाती। मछुआरा बस्ती की औरतें दिन भर धूप में मछलियां सुखाने का काम करती हैं। औरतें सारी दोपहर धागों की मोटी डोर में मछलियों को पिरोकर बांस के तिपायों पर डोर को बांधने का काम करती हैं। पूरी बस्ती में हर झोंपडे के सामने रेत पर गड़े बांसों के बीच डोर में फंसी हजारों मछलियां सूखती रहती हैं। डोर में हजारों-हजार मछलियां पिरोई रहती हैं। डोरें और उन डोरों में सुई से पिरोई गई मछलियां। अम्मा भी बतियाते हुए उन औरतों के साथ उनके काम में हाथ बंटाती है। शुरू में जब वह इस बस्ती में आई थी, तब मछुआरनें सोचती थीं कि वह शायद मछलियों के लालच में उनके पास आती है। उनके काम में इसलिए हाथ बंटाती है, ताकि जाते समय उसको कुछ मछलियां मिल जायें। बस्ती के कुछ दूसरे बुड्ढे-बुढिया भी ऐसा ही करते हैं। जब औरतें काम कर रही होती हैं, वे उन औरतों के पास पहुंच जाते हैं और तब तक नहीं जाते, जब तक उन्हें मछली नहीं मिल जाये।… पर अम्मा ने उनसे कभी मछलियां नहीं ली। शुरु में औरतें अम्मा को टालने की कोशिश भी करतीं। वे उसको मछली देकर चलता करने की कोशिश करतीं। जब वह मछली नहीं लेती तो वे जिद-सी करतीं। पर वह नहीं लेती। अम्मा कहती- उसे जरूरत नहीं। वह तो हाथ बटाने चली आई। खाली बैठे क्या करती। उसे मछलियों को डोर में पिरोकर सुखाना अच्छा लगता है। वह अब भी बीस-पच्चीस किलो मछलियों रोज पिरो सकती है। वह उन औरतों को कई किस्से भी सुनातीं। समुद्र के किस्से, जंगलों के किस्से, मछलियों के किस्से, मछुवारों के किस्से, आदमी-औरत के किस्से, मुहल्ले के किस्से, शहर के किस्से…। उसके पास किस्सों का खजाना होता। औरतें काम में मगन रहतीं और उसके किस्से सुनतीं। कुछ औरतें एक ओर मछलियों को पिरोने में लगी रहतीं तो दूसरी ओर उनका चेहरा अम्मा को टुकुरता, तो कुछ औरतें मछली पिरोना छोड़कर उसकी ओर अवाक सी ताकतीं… अपना चेहरा अपनी हथेलियों पर रखकर, उंगलियां मुंह पर रखकर उसकी ओर टकटकी लगाकर सुनतीं, तो कुछ औरतें मछलियों को पिरोकर बिलंग बांधते हुए उसकी तरफ अपना कान किये रहतीं और किस्से के बीच उसको टोकतीं- क्या-क्या फिर से बताना, अम्मा-अम्मा क्या कहा बोलो दुबारा… डोर बांधती औरतें चिल्लाती सी अम्मा से पूछतीं, अम्मा ऊंचा जो सुनती है…।
अम्मा को मछलियों की अच्छी पहचान है। मछलियों को अलग-अलग कैसे छांटते हैं, यह उसको खूब आता है। पूरी जिंदगी यही तो किया है उसने। औरतें बस एक ही तरह से मछलियां छांटती थीं। चपटी और चोंचदार मुंह वाली मछली और गोल मुंह वाली बडी मछलियां। याने सस्ती और मंहगी मछली। अम्मा ने उन्हें बताया कि इस तरह तो कभी-कभी अच्छी मछली भी सस्ती वाले टोकरे में चली जाती है। इससे पैसे का नुकसान होता है। सो औरतों को पता होना चाहिये कि सही तरह से कैसे छांटे। यह भी देखना चाहिए कि तूना और सोनमाछी कहीं सस्ती मछली की टोकरी में ना गिर जायें। ये मछलियां भी चोंचदार होती हैं, पर इनके अच्छे दाम मिलते हैं। अम्मा को मछलियों की बिकावली की बड़ी चिन्ता रहती। अगर कोई उसे मुफ्त में मछली देने की कोशिश करता, तो वह कहती- क्यों गंवाती है, इसके लिए पूरे पाँच रूपये मिलेगें… भला मुझे इसकी क्या जरूरत ? उसको लगता कि मछलियों को बेचने से बेहतर काम कोई और नहीं। मछलियां मुफ्त में मिलती हैं। समुद्र में हजारों हजार मछलियां हैं। बाजार में मछलियां अच्छे दामों में बिकती हैं।
धूप चढ़ आई है। अम्मा अभी भी टूटे फटे जाल की बिखरी प्लास्टिक की बान में गठान बांध कर जाल ठीक कर रही है। पर गठान है कि फिसल फिसल जाती है। चिकनी प्लास्टिक की बान को गठना कितना मुश्किल है। वह बार-बार गीले हाथ में रेत चिपकाकर जाल की बान को खींचती, ताकि वह फिसले नहीं और फिर पूरी ताकत लगाकर उसको गठने की कोशिश करती। जब वह पूरी ताकत से जाल को गठने की कोशिश करती, तो उसकी झोलदार और झुर्रियों से भरी बांह मछली की तरह फडकती और उसके पोपले चेहरे की हजारों-हजार रेखायें बुरी तरह तन जातीं। पर हर कोशिश नाकाम। एक भी गांठ अगर ढीली रही तो समुद्र में जाल का मुंह खुला और सारी मछलियां भाग कर जाल से बाहर… बड़ी मुश्किल है। पर अपने कमजोर और कांपते हाथों के साथ वह भिड़ रही है।
‘अम्मा … अम्मा।’
‘क्या है ?’
‘अब यह जाल बेकार हो गया है...।’
उसने चिल्लाते हुए कहा। अम्मा ऊंचा जो सुनती है। उसने जाल एक तरफ सरका दिया। अब वह बेकार हो गया है।
अगले दिन वह मछुआरा बस्ती से बहुत दूर एक दूसरी जगह गई। वहां चारों ओर समुद्र का छिछला पानी भरा था। बस घुटनों-घुटनों पानी और वह भी कई किलोमीटर दूर तक। बरसों पहले वह यहां आई थी। बरसों पहले जब वह यहां नहीं रहती थी। बरसों पहले जब वह दूसरी बस्ती में रहती थी। बरसों पहले जब उसका आदमी जिंदा था। बरसों पहले वह इस छिछले पानी वाली जगह आई थी।
उस रात उसके घर मछली नहीं थी। उस रोज शाम से ही उसका आदमी लग्गी में था। उसको और दारू पीनी थी। झोंपडे के फर्श पर वह पैर फैलाकर बैठा था। पूरे झोंपडे में दारु की बदबू फैल रही थी। उसने अम्मा से मछली लाने को कहा था। उसने बहुत प्यार से उसको मछली लाने को कहा था। अकड़कर कहता तो वह मछली नहीं लाती। उसका आदमी उससे अकड़कर कुछ भी नहीं मंगवा पाता था। जब वह अकडता अम्मा उससे चिढ़ जाती। अरे काहे की अकड़… मछली वह लाये, चावल वह लाये, झोंपडे को बुहारे वो, शीशी में कड़वा तेल वो लाये, झोपड़े की छानी वह ठीक करे, आदमी के लिए दारू का जुगाड़ वो करे, पानी वो भरे, ताडी के पेड़ को वो देखे… सब काम उसके जिम्मे और यह आदमी पूरा दिन मस्ती मारता घूमे…। ऊपर से अकड़ दिखाये...। अम्मा उससे चिढ़ जाती। पहले पहल वह उसके इस तरह चिढने पर गुस्सा हो जाता। कभी-कभी बात इतनी ज्यादा बढ जाती कि वह गुस्सा होकर उसको पीटने लगता। रेत में गड़े मछली सुखाने वाले बांस को उखाड़ कर ले आता, फिर उसको बांस से पीटता। वह बुरी तरह चीखती। वह उसके बाल पकड़ कर झोंपड़े से बहार खींच कर उसे रेत पर घसीटता। पूरा मुहल्ला तमाशा देखता। वह डर जाती। उन दिनों उसको उसकी लाल आंखे और दारू की बदबू से ही डर लगने लगा था। ऐसे में वह उसके साथ कुछ भी कर सकता था। पर उसने उसकी लाल आंखों और दारु का डटकर मुकाबला किया। अम्मा उसकी बात नहीं मानती थी। वह पिटती और रोती थी, पर उसकी गलत बात उसने नहीं मानी। वह पिटते पिटते उससे खुद को छुड़ा कर मछुआरा बस्ती की तरफ भाग जाती। बस्ती में कहीं छुप जाती। वह लाठी पटकता, पूरी बस्ती में उसे ढ़ूँढता फिरता और फिर थक-हार कर वापस झोंपड़े चला जाता। जब वह पहुंचती वह सो चुका होता। वह इंतजार करती कि कब उसका नशा उतरेगा। सुबह जब वह ठीक ठाक हो जाता तब अम्मा उसको खूब गाली देती। कभी कभी वह पूरे मुहल्ले के लोगों को इकट्ठा कर लेती। उनके सामने रोते हुए तमाशा करती। मुहल्ले के लोगों को रो-रोकर अपना दुखड़ा सुनाती। मुहल्ले के लोग उसके आदमी को कोसते। फिर वह झोंपड़ा छोड़कर भाग जाता। उसको लगता वह जीत गई। पर फिर वह दुःखी हो जाती। सोचती ऐसी भी क्या जीत? आखिर उसका ही तो आदमी है। अपने आदमी को गाली देना, भला बुरा कहना और फिर सोचना कि वह जीत गई … छिः ऐसी भी क्या जीत। वह दुःखी हो जाती, कि उसने उसको भला बुरा कहा। फिर कुछ दिनों में वह सबकुछ भूल जाती। वह बहुत जल्दी भूल जाती। पर उसने इतना तो बता ही दिया कि अकड़कर वह उसे नहीं मना सकता। सो, उसने बात मनवाने के लिए प्यार का तरीका अपनाया। वह जानती थी कि वह ढ़ोंग करता है। प्यार का दिखावा भर करता है। जब से उसने दूसरी औरत कर ली है, तब से वह दिखावा ही करता है। पर वह उस दिखावे को ही प्यार मानती। आंख बंद कर मानती कि यही प्यार है। फिर ऐसा करके वह उसके पास जा पाती। प्यार के दिखावे के सहारे ही सही, वह उसे छू पाती। उसके साथ सो पाती। उन दिनों वह अपने आदमी का कई-कई दिनों तक इंतजार करती। उसका मन करता कि वह आये और वह उससे पूरी रात प्यार करे। पर दूसरी औरत का ख्याल आने पर उसका मन भारी हो जाता। उसको गुस्सा भी आता। उसको लगता कि वह भी कोई दूसरा आदमी कर ले। पर उसने नहीं किया। जब वह दूसरी औरत के साथ चला गया तब भी वह कभी-कभार आता था। वह जानती थी कि अब प्यार नहीं है। पर फिर भी उसको उसकी जरूरत महसूस होती। उस रोज भी उसने मछली मांगी थी। दारू के साथ उसको मछली चाहिये थी।
वह निकल पड़ी मछली लाने। रात को समुद्र में जाल नहीं डाल सकते थे। फिर इतनी रात को मछली बेचने वाला भी कोई नहीं था। किसी के घर से मछली मांगना उसको अच्छा नहीं लगता था। बस उसी दिन वह इस जगह आई थी। उस छिछले समुद्र में कई मछलियां आ जातीं। जो मछलियां उतरते ज्वार के साथ वापिस नहीं जा पाती, वे इस छिछले पानी में फंस जाती। लोग कहते वे बूढी और बीमार मछलियां हैं, वे वापिस समुद्र में नही जा पाती हैं, सो वहीं फंस कर रह जाती हैं। इन मछलियो को बिना जाल के भी पकड़ा जा सकता है। अम्मा ने पहले भी एक-आध बार यहां से गुजरते समय देखा था, कुछ बूढे और कमजोर मछुआरे इस जगह मछलियां पकड रहे थे। बिना जाल के वे छिछले पानी से भिडे हुए थे। वे देर रात तक वहां डटे रहते। यहां रात को भी मछली पकडी जा सकती थी। उसने भी उस रात उन्हीं लोगों की तरह अपने पैरों से मछली पकडी। पानी में तैरने वाली उन मछलियों की चमकीली देह को ध्यान से देखकर या अपने पैरों के आसपास उन्हें महसूस कर वह उनके पास तक जाती और तेजी से अपना पैर उस मछली पर रख देती। ज्यादातर मछलियां उसके पैर के नीचे से भाग कर तेजी से पानी में दूर चली जातीं और उसका पैर पानी के नीचे की कीचड़ और मटमैली रेत में धंस जाता और आस-पास का पूरा पानी गंदा हो जाता।ऐसा बार बार करने पर घण्टों तक भिड़े रहने पर कोई मछली उसके पैर के नीचे आ दबती और रेत में धंस जाती। वह थोड़ी देर तक उसे अपने पैर से दाबे रखती और झुककर उस मछली की पूंछ पकड़ लेती। उस रात वह छिछले पानी में देर तक मछली मारती रही। बहुत देर बाद उसके पास कुछ मछलियां इकठ्ठा हो गईं। वह खुशी-खुशी उसे घर लेकर आई। उस रोज उसे अपने आदमी पर खूब प्यार आया था। पर जब वह झोंपड़ी पहुँची तब तक वह सो चुका था। पूरे झोंपड़े में दारू की बदबू फैल रही थी। वह उस रात उसे बहुत देर तक सोता हुआ देखती रही। उस रात उसकी इच्छा हुई कि वह उसे जगा दे। वह देर तक उलझी रही, क्या वह उसे छू सकती है ? उसके भीतर कुछ धुकधुका रहा था कि वह चुपके से उसके पास जाकर सो जाये और उसे जगा दे…। उस रात झोंपडे में खामोशी थी… बस हिंडालियम की पतीली में डली मछलियां अपनी पूंछ पटक रही थीं। वह पूरी रात अपने आदमी से दूर पड़ी रही और पतीली से पूंछ पटकने की टक-टक की आवाज सुनती रही…।
आज अम्मा उसी जगह फिर से गई थी। वह सुबह-सुबह ही पहुंच गई। फिर वह शाम तक भिड़ी रही। जब वह जा रही थी, उसे लगता रहा कि क्या वह फिर से उसी तरह पैरो से मछली पकड़ सकती है। उस समय उसके हाथ पैर ठीक थे। उसे अच्छा दिखता था और वह काफी तंदुरूस्त थी। पर आज...? क्या आज भी वह उसी तरह मछली पकड़ पायेगी। उस जगह पहुंच कर उसे यह देखकर अच्छा लगा कि वहां उसकी ही तरह एक और औरत मछलियां पकड़ रही थी। वह उस रोज शाम तक समुद्र में उस छिछले पानी में भिड़ी रही। उसने आखिरकार एक बडी मछली पकड़ ही ली। उसे लगा अगर वह रोज आये तो वह और अच्छा पकड़ पायेगी। रोज-रोज आने से वह इस तरह मछली पकड़ने में माहिर हो जायेगी। उस रात उसे अपने पैरो में जलन महसूस हुई। जब वह मछली पकड़ रही थी, तब कई छोटी-छोटी मछलियों ने उसके पैर के तले की मोटी खाल को नोच लिया था। उन मछलियों ने उसकी ऐड़ी और पैर के अंगूठे के तलवे की खाल को नोच लिया था। तलवे में बेहद छोटे-छोटे छेद से बन गये थे। पैर की फटी बिवाईयां जिन्हें उन मछलियों ने नोंचा था, चिनचिना रही थीं। उसने शीशी से कड़वा तेल निकाला और पैर के तले पर लगा लिया।
वह इसी तरह मछलियां पकड़ती रही थी। मुहल्ले के कुछ लोगो ने उसे फिर से मदद करनी चाही पर उसने उन्हें झड़प दिया। कुछ दिनों बाद उसकी दिनचर्या ठीक हो गई। सुबह-सुबह ही वह निकल जाती और शाम तक लौटती। फिर ज्यादा शाम को बच्चों का हल्ला-गुल्ला और रात को बाकी काम निपटा कर इधर-उधर भटकना। उसके पास समय ही कहां था।
पर इस बीच एक लड़का उसके पास आने लगा। अठारह-बीस साल का जवान लडका। वह चिलम के नशे में फंस चुका था और कुछ पाने के चक्कर में उसके पास आता था। वह भी उसे कुछ ना कुछ दे देती। कभी खाने के लिए माछी-भात, तो कभी कड़वा तेल, तो कभी रुपये दो रुपये जो कभी कभार मछली बेचने पर उसको मिल जाते। उसका नाम गोपी था। अम्मा उसे खूब समझाती कि वह काम करे। मछली पकड़ने जाये। जवान आदमी है, रोज काम पर जायेगा तो दुरुस्त रहेगा। पर गोपी नहीं गया। वह सुबह शाम उसके झोंपड़े पर आ जाता। वह उससे बतियाती और कभी-कभी डांटकर भगा भी देती। जब वह उसका कहा नहीं मानता तो उसको उस पर गुस्सा आ जाता। फिर बाद में उसको खराब भी लगता कि उसने डांट दिया...। उसे गोपी अच्छा लगता है। उसे लगता है किसी ने उसे लगा दी होगी चिलम की आदत। फिर उसको यकीन है कि उसके पास यदि गोपी आता रहा तो उसकी चिलम छूट जायेगी। वह एक ना एक दिन उसकी चिलम छुडवा ही देगी। उसके पास अड़सठ साल का अनुभव है। उसने बड़े बड़ों को ठीक किया है। पूरे मछुआरा बस्ती में उसकी तूती बोलती है। फिर वह गोपी किस खेत की मूली है। एक न एक दिन वह गोपी को मछली पकड़ने भेज ही देगी।
अम्मा खुश है। वह पहले से ज्यादा खुश है। अब जाल में गांठ मारने और मछुआरों के साथ डोंगी में भीतर समुद्र तक मछली पकड़ने से बेहतर तरीका उसके पास है। यद्यपि उसमें ज्यादा मेहनत लगती है। पर वह मेहनत से नहीं डरती।
एक रोज अम्मा सुबह जल्दी उठ गई। उसने मटकी में से ताजा ताड़ी निकाल कर पी और काम पर जाने की तैयारी करने लगी। तभी गोपी आ गया। गोपी कहने लगा -सरकारी दफ्तर से कोई मुलाजिम आया है। अभी मछुआरा बस्ती में है। किसी कागज पर बूढ़े लोगो का अंगूठा लगवाता है और पैसे देता है। वह भी कोई चार या पांच रूपये नहीं, बल्की पूरे सौ रूपये। कहता है सरकार बूढ़ों को पैसा देती है। उसी का पैसा है।…अम्मा तेरी तो लाटरी खुल गई।
अम्मा को अजीब लगा ऐसा कैसा पैसा ? पैसा तो मछली बेचने पर आता है। कुछ काम करो तो आता है। बिना काम का कैसा पैसा ? उसने आज तक कभी किसी से बिना काम का पैसा नहीं लिया। वह लोगों को बडे रौब से बताती है कि कभी नहीं लिया मुफ्त का पैसा....। सारा पैसा उसका अपना पैसा है। जितना उसके पास है, सिर्फ उसी का है। पूरी मछुआरा बस्ती जानती है...कभी नहीं लिया और अगर कोई दे गया तो उसका हिसाब भी बराबर किया। कितना कुछ तो है उसके पास। सारी बस्ती को बांटती है वह। कभी किसी से लिया नहीं। और ये सरकारी मुलाजिम....जाने क्या देने आ रहा है? पूरे अड़सठ साल में तो कोई दे नहीं पाया। उसने लिया ही नहीं। मु्फ्त का हराम होता है… उसे याद आता बचपन में बापू कहते थे… हां हराम। वह बूढी है, कमजोर है, दिखाई नहीं देता, हाथ पैर दुखते हैं, ऊंचा सुनाई देता है…पर फिर भी उसने नहीं मांगा। उसको लगता है कि वह अगर मांगती, तो वह भिखमंगन होती, अम्मा अम्मा नहीं होती। जब उसका आदमी जिंदा था, तब वह आज से कहीं ज्यादा काम करती थी। उसका आदमी तो उसके सामने गिडगिडाता रहता था… कभी किसी काम के लिए उसको पुचकारता, तो कभी किसी और काम के लिए उसकी मान मनौवल करता…। वह काम करती थी तभी ना…। नहीं तो आदमी भला कभी औरत को कहीं का छोडता है।
अम्मा को किसी से कुछ भी नहीं चाहिए। हां उसको नहीं चाहिए। और इस सरकारी मुलाजिम से तो बिल्कुल भी नहीं। इससे एक बार ले लिया तो फिर वह तो इसका हिसाब भी बराबर नहीं कर पायेगी, जैसे वह मुहल्ले के दूसरे लोगों का हिसाब बराबर कर देती है। किसी का उधार नहीं है, उस पर। इस सरकारी मुलाजिम का उधार चढ गया तो कैसे हिसाब बराबर करेगी वह...। सरकार का हिसाब बराबर करने कहां-कहां भटकेगी वह। कितने तो काम हैं, उसके पास....ऐसे में एक और चकल्लस पाल लो....सरकार का हिसाब बराबर करने की चकल्लस। आ बैल मुझे मार। फिर जाने क्यों दे रहे हैं पैसा ? मुफ्त का पैसा तो गड़बड़ी वाला बेइमानी वाला होता है। वह जब आँख बंद करती तो उसे उसका बापू दिखाई देता… बचपन का कोई चित्र जिसमें वह उलझ जाती और तब उसका मन जोर से कहता…वह कभी हरामखोरी नहीं करेगी...मुफ्त में कुछ नहीं लेगी।
सरकारी पैसा…जाने क्या मतलब ? जाने क्या हो ? काहे पर अंगूठा लगवा रहे है? कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं ? और फिर सौ बात की एक बात, क्या करना ? सारे मुहल्ले को तो बांटती फिरती है वह। उसके पास क्या नहीं है। फिर किसी से क्या लेना। उसने गोपी को मना कर दिया। गोपी को अम्मा का मना करना ठीक नहीं लगा। गोपी कहने लगा कि वह चाहे तो वह पैसा उससे लेकर उसे दे दे। उसने गोपी को डांट लगा दी। वह जब मछली मारने जाने लगेगा तब वह उसको कोई चीज लाकर देगी। बूढ़ी है तो क्या हो गया। वह ला सकती है। सारे मुहल्ले के लिए तो लाती है।
कुछ देर बाद वह सरकारी मुलाजिम उसके झोंपड़े पर पहुंचा। उसके साथ मछुआरा बस्ती के कुछ और लोग भी थे। अम्मा ने उसको मना कर दिया। मछुआरा बस्ती के लोगों ने उसको समझाया। पर वह भला किसी की सुनती है। थोडी देर बाद वे सब चले गये। बस बस्ती की दो औरतें उसके पास रूक गईं।
अम्मा कभी चुप नहीं रहती। वह कभी सोचती भी नहीं है। पर उस समय उसको अजीब सा ख्याल आया जैसे वह किसी जगह अकेली खड़ी है और उसके सामने बहुत सारे लोग खड़े हैं… मुहल्ले के सभी लोग जिन्हें वह जानती है… उसका आदमी भी जो मर चुका है, उसके आदमी की दूसरी औरत जो पता नहीं कहां है, गोपी, बस्ती के मछुआरे, वह मूछों वाला सरकारी मुलाजिम भी जो अभी-अभी उसके पास से गया है, मछुआरा बस्ती की औरतें… सभी लोग उसके सामने खड़े हैं। पूरी बस्ती में अचानक रोजमर्रा की चीजों की कमी पड गई है। सब उसके पास खडे हैं। अब क्या होगा ? सब चिंतित हैं। वह सबको ढांढस बंधा रही है और जो कुछ भी उसके पास है, वह लोगों को देती जा रही है। वह एक-एक करके सबको कुछ ना कुछ दे रही है किसी को चावल, किसी को मछली, किसी को ताड़ी, किसी को कडवा तेल, किसी को नारियल की गिरी, तो किसी को कुछ और …
तभी पास खड़ी औरत ने उससे पूछा कि वह चुप क्यों है ? तो वह खिलखिलाकर हंस पड़ी। उसके पोपले और झुर्रीदार मुंह में सामने के दो लटकते दाँत दिखने लगे। अपनी हँसी को जबरदस्ती अपने हाथों से रोक कर उसने उस औरत से कहा -
‘बताओ भला अम्मा का पिटारा कभी खत्म हो सकता है, अभी पूरे सौ साल और चलेगा समझी....।’
और फिर खिलखिलाकर हँस पड़ी।
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चर्चित युवा कहानीकार तरुण भटनागर, रायपुर (छत्तीसगढ) में जन्मे और सुदूर आदिवासी अंचल बस्तर के कस्बे में बस गये। आयु उन्तालीस वर्ष, गणित और इतिहास में स्नातकोत्तर । लेखन की शुरुआत कविताओं से। कुछ कवितायें वसुधा, साक्षात्कार, कथन, समकालीन साहित्य, कथादेश , अक्षर पर्व आदि में पत्रिकाओं में प्रकाशित, कहानियां हंस, पहल, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, संवेद आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित। दो कहानियां ‘हैलियोफोबिक’ (पहल 85) तथा गुलमेंहदी की झाडियां (वागर्थ युवा विशेषांक) विशेष चर्चित रहीं। एक कहानी संग्रह ‘गुलमेंहदी की झाड़ियां’, भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित ।
संप्रति- मध्यप्रदेश में शासकीय नौकरी ।
संपर्क : संयुक्त कलेक्टर, एफ 1 , आफीसर्स कालोनी , धार , जिला धार, (म. प्र.),
फोन : 094251-91559