मेरी बात

सुभाष नीरव
मंहगाई का गहराता संकट और खत्म होती कृषि ज़मीन
मंहगाई की मार से आज हरतरफ त्राहि-त्राहि मची है। कहते हैं कि मंहगाई की ऐसी मार पहले कभी नहीं पड़ी। इधर, ‘जनसता’ के 4 मई 2008 के अंक में सत्येंद्र रंजन का इसी समस्या पर एक बेहद महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुआ है– “अब सवाल पेट भरने का है”। सत्येंद्र रंजन अपने आलेख में इससे जुड़े प्रमुख सवालों से ही नहीं टकराते, इस समस्या के पैदा होने के कारणों को भी खोजने की कोशिश करते हैं। वह कहते हैं कि दुनिया जिस समय विकास के एक नए स्तर पर पहुंची मानी जा रही है, उसी समय मानव समाज को सबसे बुनियादी समस्या ने घेर लिया है। समस्या खाने की है। अनाज का गहरा संकट सारी दुनिया में पैदा हो गया है। उन्होंने इसकी दो वजहें बताई हैं– इंसानी और आसमानी। आसमानी वजहों जिसके पीछे एक हद तक इंसान का ही हाथ मानते हैं, में आस्ट्रेलिया में पिछले दो साल से पड़ रहे अकाल को मानते हैं। आस्ट्रेलिया दुनिया में गेहूं का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। इस अकाल के चलते वहां से निर्यात न हो पाने की वजह से विश्व बाजार में गेहूं की भारी कमी हो गई है। मलेशिया और फिलीपींस जैसे पूर्वी एशियाई देशों में चावल की पैदावार घटने से ऐसी ही स्थिति चावल को लेकर बनी है। इंसानी वजहों का जिक्र करते हुए सत्येंद्र रंजन कहते हैं कि कुदरत की मार पर आसानी से काबू पाया जा सकता था अगर अमेरिका और लातिन अमेरिका के कुछ देशों में अनाज की खेती के लिए उतनी जमीन मौजूद रहती जितनी अभी हाल तक रहती थी और वहां अनाज का इस्तेमाल खाने की बजाय दूसरे मकसद के लिए नहीं होता। दरअसल कच्चे तेल के बढ़ते दाम और तेल के भंडार खत्म होने के अंदेशे की वजह से अमेरिका जैसे देशों ने जैव–ईंधन पर जोर देना शुरू किया है। वहां मक्के और गन्ने की खेती ज्यादा जमीन पर की जाने लगी है और इन फसलों का इस्तेमाल खाने की बजाय इथोनेल और बायो-फ्यूएल यानी जैव–ईंधन बनाने के लिए होने लगा है। वह अनाज के लिए उपलब्ध जमीन और अनाज की मात्रा दोनों में आई कमी को विश्व बाजार में अनाज की कमी और कीमतों में वृद्धि का कारण मानते हैं। दूसरी तरफ, भारत की स्थिति का जायजा लेते हुए सत्येंद्र कहते हैं कि हाल के वर्षों में भारत में अनाज के बजाय कपास और ऐसी दूसरी फसलों की खेती का चलन बढ़ता गया है जिसे बाजार में बेच कर पैसा कमाया जा सके। किसान ऐसी खेती करने के लिए इसलिए मजबूर होते हैं कि अनाज का उन्हें भरपूर दाम नहीं मिलता और अनाज उपजाने वाले किसान गरीबी में दम तोड़ते रहते हैं। यही नहीं भारत में भी अब जैव–ईंधन को बढ़ावा मिल रहा है। बताया जाता है कि सरकार 2017 तक देश की परिवहन ईंधन की कुल जरूरत का दस फीसदी जैव ईंधन से हासिल करना चाहती है और इसके लिए एक करोड़ बीस लाख हेक्टेयर में जैव–ईंधन के काम आने वाली फसलें ही उगाई जाएंगी। सत्येंद्र रंजन इसे एक दुश्चक्र मानते हुए कहते हैं कि दुनिया भर के गरीबों के मुंह से आहार छीनने के हालात पैदा किए जा रहे हैं। गेहूं, चावल, अनाज, दलहन और तिलहन की खेती की जमीन में लगातार होती गिरावट के साक्ष्य में जो आंकड़े वह प्रस्तुत करते हैं, वे चौकाने वाले हैं। वे बताते हैं कि भारत में पिछले वर्ष दो करोड़ बयासी लाख चौदह हजार हेक्टेयर जमीन पर गेहूं की खेती हुई थी, मगर इस साल यह खेती सिर्फ दो करोड़ सहतर लाख अड़तालीस हजार हेक्टेयर जमीन पर हुई है। इसी तरह, मोटे अनाजों की पिछले साल सत्तर लाख सत्तावन हजार हेक्टेयर जमीन पर खेती हुई थी जो कि इस साल घट कर अड़सठ लाख सोलह हजार हेक्टेयर रह गई है। यही हाल दालों और तिलहन का भी है।मेरा मानना है कि इस समस्या के पीछे सत्येंद्र रंजन द्वारा बताए गए कारण तो हैं ही, इसके अतिरिक्त आज दुनिया भर में तीव्र गति से होता विकास भी एक कारण है। विकास के नाम पर शहरों का विस्तार इधर कुछ वर्षों में जिस तेजी से बढ़ा है वह चौकाने वाला है। भारत में दिल्ली, मुम्बई, जयपुर जैसे महानगरों में इस अंधाधुंध विकास को देखा जा सकता है। शहरों ने अपने आसपास के गांवों की खेती योग्य जमीन को बड़ी तेजी से लीला है और लीलने की यह प्रक्रिया अभी भी निरंतर जारी है। जहां पहले हरे भरे लहलहाते खेत हुआ करते थे, वहां मल्टी स्टोरी आवासीय फ्लैट्स, शापिंग माल्स, कारपोरेट दफ्तर आदि नजर आते हैं। किसानों से औने पौने दामों में खरीदी गई जमीनों की कीमतें आकाश को छूने लगी हैं। कृषि उपयोगी जमीनों को अगर इसी प्रकार खत्म करने की प्रक्रिया जारी रही तो निश्चित ही आने वाले समय में खाद्यायन और आहार की समस्या भंयकर रूप ले सकती है। सत्येंद्र रंजन ने अपने आलेख में बहुत गौरतलब बात लिखी है कि “दुनिया चाहे विकास की जिस मंजिल पर पहुंच जाए, खेती उसकी बुनियाद बनी रहेगी। बिना भोजन किए न तो अंतरिक्ष की यात्रा की जा सकती है और न इंटरनेट और सूचना तकनीक के जरिए सारी दुनिया से जुड़े रहने का आनंद लिया जा सकता है।”
मंहगाई का गहराता संकट और खत्म होती कृषि ज़मीन
मंहगाई की मार से आज हरतरफ त्राहि-त्राहि मची है। कहते हैं कि मंहगाई की ऐसी मार पहले कभी नहीं पड़ी। इधर, ‘जनसता’ के 4 मई 2008 के अंक में सत्येंद्र रंजन का इसी समस्या पर एक बेहद महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुआ है– “अब सवाल पेट भरने का है”। सत्येंद्र रंजन अपने आलेख में इससे जुड़े प्रमुख सवालों से ही नहीं टकराते, इस समस्या के पैदा होने के कारणों को भी खोजने की कोशिश करते हैं। वह कहते हैं कि दुनिया जिस समय विकास के एक नए स्तर पर पहुंची मानी जा रही है, उसी समय मानव समाज को सबसे बुनियादी समस्या ने घेर लिया है। समस्या खाने की है। अनाज का गहरा संकट सारी दुनिया में पैदा हो गया है। उन्होंने इसकी दो वजहें बताई हैं– इंसानी और आसमानी। आसमानी वजहों जिसके पीछे एक हद तक इंसान का ही हाथ मानते हैं, में आस्ट्रेलिया में पिछले दो साल से पड़ रहे अकाल को मानते हैं। आस्ट्रेलिया दुनिया में गेहूं का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। इस अकाल के चलते वहां से निर्यात न हो पाने की वजह से विश्व बाजार में गेहूं की भारी कमी हो गई है। मलेशिया और फिलीपींस जैसे पूर्वी एशियाई देशों में चावल की पैदावार घटने से ऐसी ही स्थिति चावल को लेकर बनी है। इंसानी वजहों का जिक्र करते हुए सत्येंद्र रंजन कहते हैं कि कुदरत की मार पर आसानी से काबू पाया जा सकता था अगर अमेरिका और लातिन अमेरिका के कुछ देशों में अनाज की खेती के लिए उतनी जमीन मौजूद रहती जितनी अभी हाल तक रहती थी और वहां अनाज का इस्तेमाल खाने की बजाय दूसरे मकसद के लिए नहीं होता। दरअसल कच्चे तेल के बढ़ते दाम और तेल के भंडार खत्म होने के अंदेशे की वजह से अमेरिका जैसे देशों ने जैव–ईंधन पर जोर देना शुरू किया है। वहां मक्के और गन्ने की खेती ज्यादा जमीन पर की जाने लगी है और इन फसलों का इस्तेमाल खाने की बजाय इथोनेल और बायो-फ्यूएल यानी जैव–ईंधन बनाने के लिए होने लगा है। वह अनाज के लिए उपलब्ध जमीन और अनाज की मात्रा दोनों में आई कमी को विश्व बाजार में अनाज की कमी और कीमतों में वृद्धि का कारण मानते हैं। दूसरी तरफ, भारत की स्थिति का जायजा लेते हुए सत्येंद्र कहते हैं कि हाल के वर्षों में भारत में अनाज के बजाय कपास और ऐसी दूसरी फसलों की खेती का चलन बढ़ता गया है जिसे बाजार में बेच कर पैसा कमाया जा सके। किसान ऐसी खेती करने के लिए इसलिए मजबूर होते हैं कि अनाज का उन्हें भरपूर दाम नहीं मिलता और अनाज उपजाने वाले किसान गरीबी में दम तोड़ते रहते हैं। यही नहीं भारत में भी अब जैव–ईंधन को बढ़ावा मिल रहा है। बताया जाता है कि सरकार 2017 तक देश की परिवहन ईंधन की कुल जरूरत का दस फीसदी जैव ईंधन से हासिल करना चाहती है और इसके लिए एक करोड़ बीस लाख हेक्टेयर में जैव–ईंधन के काम आने वाली फसलें ही उगाई जाएंगी। सत्येंद्र रंजन इसे एक दुश्चक्र मानते हुए कहते हैं कि दुनिया भर के गरीबों के मुंह से आहार छीनने के हालात पैदा किए जा रहे हैं। गेहूं, चावल, अनाज, दलहन और तिलहन की खेती की जमीन में लगातार होती गिरावट के साक्ष्य में जो आंकड़े वह प्रस्तुत करते हैं, वे चौकाने वाले हैं। वे बताते हैं कि भारत में पिछले वर्ष दो करोड़ बयासी लाख चौदह हजार हेक्टेयर जमीन पर गेहूं की खेती हुई थी, मगर इस साल यह खेती सिर्फ दो करोड़ सहतर लाख अड़तालीस हजार हेक्टेयर जमीन पर हुई है। इसी तरह, मोटे अनाजों की पिछले साल सत्तर लाख सत्तावन हजार हेक्टेयर जमीन पर खेती हुई थी जो कि इस साल घट कर अड़सठ लाख सोलह हजार हेक्टेयर रह गई है। यही हाल दालों और तिलहन का भी है।मेरा मानना है कि इस समस्या के पीछे सत्येंद्र रंजन द्वारा बताए गए कारण तो हैं ही, इसके अतिरिक्त आज दुनिया भर में तीव्र गति से होता विकास भी एक कारण है। विकास के नाम पर शहरों का विस्तार इधर कुछ वर्षों में जिस तेजी से बढ़ा है वह चौकाने वाला है। भारत में दिल्ली, मुम्बई, जयपुर जैसे महानगरों में इस अंधाधुंध विकास को देखा जा सकता है। शहरों ने अपने आसपास के गांवों की खेती योग्य जमीन को बड़ी तेजी से लीला है और लीलने की यह प्रक्रिया अभी भी निरंतर जारी है। जहां पहले हरे भरे लहलहाते खेत हुआ करते थे, वहां मल्टी स्टोरी आवासीय फ्लैट्स, शापिंग माल्स, कारपोरेट दफ्तर आदि नजर आते हैं। किसानों से औने पौने दामों में खरीदी गई जमीनों की कीमतें आकाश को छूने लगी हैं। कृषि उपयोगी जमीनों को अगर इसी प्रकार खत्म करने की प्रक्रिया जारी रही तो निश्चित ही आने वाले समय में खाद्यायन और आहार की समस्या भंयकर रूप ले सकती है। सत्येंद्र रंजन ने अपने आलेख में बहुत गौरतलब बात लिखी है कि “दुनिया चाहे विकास की जिस मंजिल पर पहुंच जाए, खेती उसकी बुनियाद बनी रहेगी। बिना भोजन किए न तो अंतरिक्ष की यात्रा की जा सकती है और न इंटरनेट और सूचना तकनीक के जरिए सारी दुनिया से जुड़े रहने का आनंद लिया जा सकता है।”
हिंदी कहानी
घर बोला
सुदर्शन वशिष्ठ
‘कारो !... कारो!’ किसी ने मुझे पुकारा। बहुत ही आत्मीय संबोधन था। नेह भरा, जो सीधा मेरे अंतर्मन में समा गया। बरसों बाद मुझे किसी ने इस नाम से पुकारा।
‘कारो... ओंकारो...’ मेरा बचपन का संबोधन। पैंतालीस बरस की उम्र में कोई पांच वर्ष नाम से पुकारे...कितना रोमांचक लगता है। एक झुरझुरी-सी फैल गई एड़ी से चोटी तक। आज इतने बरसों बाद कौन मुझे इस नाम से पुकार रहा है। एकाएक पांव ठिठक गए और पलटकर देखा। पीछे दूर तक कोई न था। दुकानों में बैठे इक्का-दुक्का लोग अपनी बातों में व्यस्त थे। अपने ही बाजार में सब अजनबी से दिख रहे थे। आपस में बतियाते हुए। चारों ओर देखने पर भी कोई न दिखा तो अनमना-सा मैं आगे बढ़ गया।
एक चमक जो मन में कौंधी थी, उसी क्षण बुझ गई।
हलवाई की दुकान के साथ एक संकरी गली जाती थी। गली क्या, दो दुकानों की दीवारों के बीच न जाने किस कारण बची हुई जगह थी। इस गली से मैं बाजार आया-जाया करता था। कई बार गली में खड़ा हो जेब से सिक्के निकाल हथेली में टटोलता... कहीं गिर तो नहीं गए। घर जाती बार नमकीन सेमियां मुट्ठी भर मुंह में ठूंस लेता। गली के आगे कोल्हू था, जहां कच्ची घाणी का तेल मिलता था, जिसे मुंह पर मलते ही आंखों में आंसू आ जाते। गली के एक ओर खली और तेल की, दूसरी ओर हलवाई के पकवानों की गंध समाई रहती।
संकरी गली में गुजरते ही मेरे पांव नन्हें हो गए, जिस्म हल्का-फुल्का। मैं हवा में फुदकने लगा। जैसे बाजार से सौदा लेकर कंधे में झोला लटकाए भाग रहा हूँ। घर में माँ का इंतजार में है कि गुड़ आएगा तो चाय बनेगी। पता नहीं, कब मैं किसी के पिछवाड़े, किसी आंगन से होकर कुल्ह पर बनी बांस की पुलिया पार कर गया। पुलिया के नीचे तेजी से बह रही कुल्ह के पानी की ठंडी फुहार के छींटे ही महसूस कर पाया, बस। कुल्ह के उस पार सिलनुमा घिसे पत्थरों पर कोई औरत बर्तन मांज रही थी। उससे आगे चाचा के घर तक जाने-पहचाने चौड़े-चकले पत्थर, जिनमें से किस पर पांव रखना है, किस पर नहीं, चाहे छलांग ही क्यों न लगानी पड़े, यह मैं अभी भी नहीं भूला।
चाचा बाहर बैठे थे, लुकाठ की छाया में। मैंने पैर छुए। ‘आओ... आओ... कब आए, यह है ओ पी भारद्वाज...’ उन्होंने प्रसन्नता जाहिर करते हुए पास बैठे अजनबी से परिचय कराया। ‘भारद्वाज कौन ! मैंने पहचाना नहीं।’ अजनबी की लगभग साठ बरस पुरानी आंखों में और अजनबीपन गहरा गया। ‘भाई, यहां रहते थे ये।’ उन्होंने नीचे की ओर इशारा किया। ‘इन्हीं का था ये सब कुछ।’
चाचा की बांह के इशारे से नीचे नजर गई, तो मन धक् से बैठ गया। ढलती धूप में ढहता हुआ घर उदास खड़ा था एकदम मौन।
‘कारो।’ चाचा ने सुन में कहा। ‘हां, हां... कारो... कारो’ वे सज्जन जब ‘कारो’ नाम लेकर जोर से हंसे तो एकाएक बहुत नज़दीकी लगे। हंसते-हंसते वे पुरानी यादों में खो गए।
‘ओ हो। क्या जमाना था वह भी। भाई, आदमियों से ही होता है सब कुछ घर बार, सब। आप तो अब बाहर ही रहते हैं... बचपन के बाद देखे ही नहीं।’ उन्होंने मेरी ओर प्रश्न भरी निगाहों से देखा। मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया।
मैं एकाएक 45 वर्ष का हो गया। पांवों की स्फूर्ति की जगह शिथिलता ने ले ली।
तभी जाना, बचपन फिर से नहीं जिया जा सकता। चाय-पानी के बाद मेरे पांव बरबस ही घर की ओर बढ़ गए।
ऊबड़-खाबड़ आंगन में एक और सिल पड़ी थी। जब इस सिल पर दाल पीसी जाती थी, तो समझ लिया जाता था कि आज या तो त्योहार है या किसी का जन्मदिन। बीच में तुलसी का चबूतरा जिसमें उगी घासफूस सूख गई थी। सावन की अंधेरी रातों में इस तुलसी के झरोखे में रखा दीपक माँ की आस की तरह टिमटिमाता था। ऊपर की ओर भाई ने एक बार नींव डाली थी, जिसके पत्थर यादों की तरह आधे डूबे, आधे उखड़े पड़े थे।
आंगन रंगमंच का नाम है। घर यदि नेपथ्य है, तो आंगन खुला मंच जहाँ दृश्य सबके सामने बेपर्दा होकर आता है। आंगन में सभी पात्र एकदम तैयार होकर निकलते हैं, खुशी में, गमी में।
घर ने मुझे देख जोर से पुकारा।
हमारे घर एक ‘घरप्पण’ गाया होती थी, जिसकी माँ, नानी तक हमारे घर की थी। मुझे दूर से आते देख ही रंभा उठती थी। करीब जाते ही वह अपना गला खुजलाने के लिए मेरी बाहों में डाल देती। ठीक गाय के रंभाने की तरह घर का आर्तनाद सुन मेरे पांव वहीं जम गए।
‘पुराने पेड़ों में जीव पड़ जाता है,’ पिता कहा करते थे। तभी पुराने पेड़ को कोई नहीं काटता। कुछ पेड़ गांव में ऐसे थे, जिनकी उम्र सौ बरस बताया करते थे। न कोई इन्हें बेचने का साहस करता, न कोई खरीदने का। जब कभी ऐसा बूढ़ा पेड़ कोई काटता है या आंधी से गिरता है तो जोर से दर्दनाक आवाज में चीत्कार उठता है। पिता ऐसे किस्से सुनाते थे कि गांव के ठीक बीच का फलां पेड़ जब आंधी में गिरा तो इतनी जोर से चिल्लाया कि पहाडि़यों में उसकी प्रतिध्वनि गूंजती रही कई दिन। उसमें रहने वाले देवता, राक्षस, भूत-प्रेत, बेआसरा होकर कई दिन राह चलते लोगों को तंग करते रहे।
पुराने घर में भी पुराने पेड़ की तरह जीव पड़ जाता है।
आंगन की ऊँची घास में एक चिडि़या फुदक रही थी, वही चिडि़या जो आंगन में आए तो समझा जाता कि घर में कोई नया आने वाला है, चाहे वह बालक हो या बछिया। चिडि़या आहट सुनकर फुर्र से उड़ गई। माँ होती तो कहती, ‘इसे मत उड़ाना, यह बढ़त की निशानी है।’ फाख्ता का एक जोड़ा अंदर चोग चुग्ग चुग रहा था, ठीक बीच में कमरे में नि:शंक भाव से।
‘घर के अंदर बुरे होते हैं ये जंगली पखेरू... उड़ा इन्हें।’ माँ की आवाज गूंजी। मैंने यंत्रवत् एक कंकर उठाकर जोर से उधर फेंका। फड़फड़ाकर फाख्ता उड़ गई। चचेरा भाई दौड़ा आया। शायद वह मुझे देख रहा था।
‘सांप तो नहीं था ? यहाँ एक रहता है आजकल।’ भाई ने दूर से देखकर कहा।
‘सांप!’ मैं चौंका, ‘नहीं-नहीं, फाख्ता थी।’
‘फाख्ता !’ वह मुझे हैरानी से देखने लगा।
‘रसोई यहीं थी न,’ मैंने कंकर मारने की झेंप मिटाने के लिए कहा। ‘रसोई, न-न, यहाँ नहीं थी, वह तो अगले कमरे में थी जो गिर गया है। यह जो है उसकी दीवार।’ मैं रसोई वाली जगह से थोड़ी दूर बैठ गया। सच ही रसोई की थोड़ी सी दीवार बची थी, जहाँ पर धुएं के निकास के लिए सुराख बना था।
ढहा हुआ घर सजीव और साकार हो गया। एकदम जिंदा। किसी बुजुर्ग की आत्मा की तरह वह मुझे
बोल उठा।
रसोई में माँ के चूल्हे पर चढ़ी सब्जी की भीनी-भीनी गंध फैल रही है, चहुं ओर। न जाने कैसे, माँ चाहे उबालकर ही बनाए, हर चीज़ का अपना ही स्वाद होता है। चूल्हे में जली आग पता नहीं कितनी पीढि़यों से चली आ रही है, पता नहीं वही आदिम आग है, जो कभी अकेला बुजुर्ग यहाँ बसने के साथ अपने साथ लाया था। उपले की राख में छिपी आग हर रात के बाद सुबह ताजा होकर निकलती है। हर रात चूल्हे में उपले दबाती हुइ माँ कहती है– ‘आग मांगी नहीं जाती पगले।’ यह घर की बरकत होती है। यही आग अच्छे और बुरे काम में इस्तेमाल होती है।
पिता हुक्का गुड़गुड़ा रहे हैं, साथ के कमरे में। भाई-बहन कभी अंदर कभी आंगन में भाग रहे हैं। जब ज्यादा हल्ला मचाते हैं तो पिता हुक्के से मुंह हटाकर हुंकार भरते हैं। और हम सब रसोई में दुबक जाते हैं।
‘जिनके घर नहीं होते, वे कहाँ रहते हैं भैया।’ भाई के इस अबोध प्रश्न ने मेरी तंद्रा भंग कर दी। एक खालीपन मुझे लील गया। सच, कहाँ रहेंगे वे, जिनके घर ढहते हैं। घर कवच है जो मर्मस्थलों की रक्षा करता है। सच, घर अपने शरीर की तरह है। बहुत ही अपना, बहुत ही आत्मीय। एकदम निजी। घर एक जानी-पहचानी जगह स्थिर होता है। जाना-पहचाना आंगन, पहचाना पिछवाड़ा, बाग-बागीचा, वहाँ घुप्प अंधेरे में भी सुई तक ढूंढी जा सकती है।
यह घर भी वैसा ही था। अनुराग भरा, एकदम अपना। बैठक में पिता का तख्तपोश, उनके बैठने से घिसी दीवार, जिसके सहारे हर सफलता-असफलता के बाद पिता लेट जाते। कौन-सी खिड़की से कौन-सा दृश्य दिखेगा, कहाँ रिमझिम बारिश आंगन में कुकुरमुत्ते की तरह बरसेगी, कहाँ हवा से लहराते आम के बौर दिखेंगे, कहाँ से लहराते बांस... सब जाना पहचाना।
घर बनता है बड़े चाव से, बड़े अरमान से। बुजुर्गों के मन का नक्शा घर में साकार होता है।
वे बहुत बदनसीब होते हैं, जिनके घर ढहते हैं।
बरसात की शाम थी वह। गड़गड़ाहट के साथ दीवार गिरी थी। पिता हुक्का गुड़गुड़ाते हुए हुक्का हाथ में ही उठाए बाहर आ गए थे। कच्ची ईंटों की धूल उनकी बैठक में भर गई। उनके चेहरे पर विवशता, घबराहट और मायूसी एक साथ उभर आई। पहले कमरे की पहली दीवार गिरी थी, उस बरसात में। उस समय भाई बाहर नौकरी में थे। मैं केवल मूक दर्शक था। इस दीवार के गिरने के बाद भी घर बरसों टिका रहा। बुजु़र्गों में एक सत होता है। शायद उसी सत के सहारे घर एकदम नहीं गिरा, किन्तु ढहता रहा निरंतर। बहनें ब्याही गईं। पहले भाई ने घर छोड़ा, फिर मेरी नौकरी लग गई। पिता गए। माँ कुछ दिन अकेली घिसटती रही। घर ढहता रहा निरंतर... घर तो परिजनों से ही होता है न। दीवारें, ईंट, गारा तो घर नहीं होता।
अंत में चाचा का पत्र आया– ‘भाई तुम्हारा तो दिल्ली बस गया है। तुम अभी नजदीक हो, इसलिए तुम्हें ही लिख रहा हूँ। घर बिलकुल ढह गया है।’ पत्र पढ़ने पर एक दर्दनाक चीख गूंज गई, जो मेरे मन-मस्तिष्क को बेंधती गई।
घर का ढहना एक भयानक और कंपा देने वाली घटना होती है। बहुत आवाज करता है घर ढहती बार। जैसे भूचाल की स्थिति आ जाती है। और भूचाल आए बिना घर का ढहना और यंत्रणादायक हो जाता है, इसकी गूंज दूर-दूर तक फैलती जाती है।
रसोई की बची हुई दीवार में दो छेद बन गए थे। एक छेद जो पहले का था, जहाँ से धुआं निकलता था। उस छेद से कभी-कभी माँ आंगन में आने की आहट सुनकर देखने का प्रयास करती थी। दो छेद देख लग रहा था, माँ की दो आँखें अब भी देख रही हैं, आंगन में आहट जो हुई है। घर ढहती बार माँ ने कहा होगा– ‘घर ! तू यहाँ से मत ढहना। मेरी आँखों के लिए जगह रखना। मेरे छोटे बेटे ने मेरे पास आना है, जो मुझे बहुत प्यारा है। खाना पकाती बार शाम के समय आंगन में आहट होगी तो मैं उसे यहाँ से देखूंगी। वह चुपचाप बिना आवाज किए आता है। फिर भी उसकी आहट से तो मैं पहचान ही जाती हूँ।’
चाचा के घर रात को ठीक से नींद नहीं आई। रात भर गिरते हुए बूढ़े आदमी के सहारे के लिए फैलाईं बाहें दिखती रहीं। जैसे जमीन फट गई हो और कोई उसमें धंसता जा रहा हो। बुजु़र्ग सहारे के लिए पुकार रहा हो, ‘मुझे बचा लो ! मुझे बचा लो ! मेरी बाहों की ताकल निचुड़ गई है।’
गहराती रात में अंधेरे में डूबते जहाज-सा घर बाहें फैलाए ढहता हुआ दिखता रहा। सुबह मुंह अंधेरे ही में, मैं वापस आने लगा तो चाचा ने कहा, ‘यहीं रहना था, आज तुम्हारा भाई बता रहा था, तू वहाँ रो रहा था। बड़ी बेदण आ रही थी... जिस माटी में बढ़े हैं बच्चे, उसका मोह तो होगा ही। अब क्या करना, ऐसा ही है संसार।’ उन्होंने उच्छ्वास लिया।
जब मैंने चलने से पहले पैर छुए तो उन्होंने कहा, ‘हाँ, यदि तुम्हारा यहाँ बसने का इरादा न हो, तो बता देना। जमीन बेचनी हो तो पहले हमें ही पूछना भाई।’
चलती बार बाहर से मैंने नीचे देखा, घर अभी अंधेरे में डूबा हुआ था।
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जन्म:24 सितम्बर 1949, गांव –अरला, पालमपुर तहसील(हिमाचल प्रदेश)
शिक्षा:एम ए (हिंदी), हिमाचल विश्वविद्यालय।
कृतियाँ :सात कहानी संग्रह, दो उपन्यास, दो काव्य संकलन, दो नाटक, दो शोध प्रबंध, चार यात्रा वृतांत। इसके अतिरिक्त, चार कहानी संकलन, दो काव्य संकलनों का संपादन। सोमसी, हिमभारती आदि सरकारी पत्रिकाओं का संपादन।
संप्रति–हिमाचल कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी के सचिव।
दूरभाष–09418085595
घर बोला
सुदर्शन वशिष्ठ
‘कारो !... कारो!’ किसी ने मुझे पुकारा। बहुत ही आत्मीय संबोधन था। नेह भरा, जो सीधा मेरे अंतर्मन में समा गया। बरसों बाद मुझे किसी ने इस नाम से पुकारा।
‘कारो... ओंकारो...’ मेरा बचपन का संबोधन। पैंतालीस बरस की उम्र में कोई पांच वर्ष नाम से पुकारे...कितना रोमांचक लगता है। एक झुरझुरी-सी फैल गई एड़ी से चोटी तक। आज इतने बरसों बाद कौन मुझे इस नाम से पुकार रहा है। एकाएक पांव ठिठक गए और पलटकर देखा। पीछे दूर तक कोई न था। दुकानों में बैठे इक्का-दुक्का लोग अपनी बातों में व्यस्त थे। अपने ही बाजार में सब अजनबी से दिख रहे थे। आपस में बतियाते हुए। चारों ओर देखने पर भी कोई न दिखा तो अनमना-सा मैं आगे बढ़ गया।
एक चमक जो मन में कौंधी थी, उसी क्षण बुझ गई।
हलवाई की दुकान के साथ एक संकरी गली जाती थी। गली क्या, दो दुकानों की दीवारों के बीच न जाने किस कारण बची हुई जगह थी। इस गली से मैं बाजार आया-जाया करता था। कई बार गली में खड़ा हो जेब से सिक्के निकाल हथेली में टटोलता... कहीं गिर तो नहीं गए। घर जाती बार नमकीन सेमियां मुट्ठी भर मुंह में ठूंस लेता। गली के आगे कोल्हू था, जहां कच्ची घाणी का तेल मिलता था, जिसे मुंह पर मलते ही आंखों में आंसू आ जाते। गली के एक ओर खली और तेल की, दूसरी ओर हलवाई के पकवानों की गंध समाई रहती।
संकरी गली में गुजरते ही मेरे पांव नन्हें हो गए, जिस्म हल्का-फुल्का। मैं हवा में फुदकने लगा। जैसे बाजार से सौदा लेकर कंधे में झोला लटकाए भाग रहा हूँ। घर में माँ का इंतजार में है कि गुड़ आएगा तो चाय बनेगी। पता नहीं, कब मैं किसी के पिछवाड़े, किसी आंगन से होकर कुल्ह पर बनी बांस की पुलिया पार कर गया। पुलिया के नीचे तेजी से बह रही कुल्ह के पानी की ठंडी फुहार के छींटे ही महसूस कर पाया, बस। कुल्ह के उस पार सिलनुमा घिसे पत्थरों पर कोई औरत बर्तन मांज रही थी। उससे आगे चाचा के घर तक जाने-पहचाने चौड़े-चकले पत्थर, जिनमें से किस पर पांव रखना है, किस पर नहीं, चाहे छलांग ही क्यों न लगानी पड़े, यह मैं अभी भी नहीं भूला।
चाचा बाहर बैठे थे, लुकाठ की छाया में। मैंने पैर छुए। ‘आओ... आओ... कब आए, यह है ओ पी भारद्वाज...’ उन्होंने प्रसन्नता जाहिर करते हुए पास बैठे अजनबी से परिचय कराया। ‘भारद्वाज कौन ! मैंने पहचाना नहीं।’ अजनबी की लगभग साठ बरस पुरानी आंखों में और अजनबीपन गहरा गया। ‘भाई, यहां रहते थे ये।’ उन्होंने नीचे की ओर इशारा किया। ‘इन्हीं का था ये सब कुछ।’
चाचा की बांह के इशारे से नीचे नजर गई, तो मन धक् से बैठ गया। ढलती धूप में ढहता हुआ घर उदास खड़ा था एकदम मौन।
‘कारो।’ चाचा ने सुन में कहा। ‘हां, हां... कारो... कारो’ वे सज्जन जब ‘कारो’ नाम लेकर जोर से हंसे तो एकाएक बहुत नज़दीकी लगे। हंसते-हंसते वे पुरानी यादों में खो गए।
‘ओ हो। क्या जमाना था वह भी। भाई, आदमियों से ही होता है सब कुछ घर बार, सब। आप तो अब बाहर ही रहते हैं... बचपन के बाद देखे ही नहीं।’ उन्होंने मेरी ओर प्रश्न भरी निगाहों से देखा। मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया।
मैं एकाएक 45 वर्ष का हो गया। पांवों की स्फूर्ति की जगह शिथिलता ने ले ली।
तभी जाना, बचपन फिर से नहीं जिया जा सकता। चाय-पानी के बाद मेरे पांव बरबस ही घर की ओर बढ़ गए।
ऊबड़-खाबड़ आंगन में एक और सिल पड़ी थी। जब इस सिल पर दाल पीसी जाती थी, तो समझ लिया जाता था कि आज या तो त्योहार है या किसी का जन्मदिन। बीच में तुलसी का चबूतरा जिसमें उगी घासफूस सूख गई थी। सावन की अंधेरी रातों में इस तुलसी के झरोखे में रखा दीपक माँ की आस की तरह टिमटिमाता था। ऊपर की ओर भाई ने एक बार नींव डाली थी, जिसके पत्थर यादों की तरह आधे डूबे, आधे उखड़े पड़े थे।
आंगन रंगमंच का नाम है। घर यदि नेपथ्य है, तो आंगन खुला मंच जहाँ दृश्य सबके सामने बेपर्दा होकर आता है। आंगन में सभी पात्र एकदम तैयार होकर निकलते हैं, खुशी में, गमी में।
घर ने मुझे देख जोर से पुकारा।
हमारे घर एक ‘घरप्पण’ गाया होती थी, जिसकी माँ, नानी तक हमारे घर की थी। मुझे दूर से आते देख ही रंभा उठती थी। करीब जाते ही वह अपना गला खुजलाने के लिए मेरी बाहों में डाल देती। ठीक गाय के रंभाने की तरह घर का आर्तनाद सुन मेरे पांव वहीं जम गए।
‘पुराने पेड़ों में जीव पड़ जाता है,’ पिता कहा करते थे। तभी पुराने पेड़ को कोई नहीं काटता। कुछ पेड़ गांव में ऐसे थे, जिनकी उम्र सौ बरस बताया करते थे। न कोई इन्हें बेचने का साहस करता, न कोई खरीदने का। जब कभी ऐसा बूढ़ा पेड़ कोई काटता है या आंधी से गिरता है तो जोर से दर्दनाक आवाज में चीत्कार उठता है। पिता ऐसे किस्से सुनाते थे कि गांव के ठीक बीच का फलां पेड़ जब आंधी में गिरा तो इतनी जोर से चिल्लाया कि पहाडि़यों में उसकी प्रतिध्वनि गूंजती रही कई दिन। उसमें रहने वाले देवता, राक्षस, भूत-प्रेत, बेआसरा होकर कई दिन राह चलते लोगों को तंग करते रहे।
पुराने घर में भी पुराने पेड़ की तरह जीव पड़ जाता है।
आंगन की ऊँची घास में एक चिडि़या फुदक रही थी, वही चिडि़या जो आंगन में आए तो समझा जाता कि घर में कोई नया आने वाला है, चाहे वह बालक हो या बछिया। चिडि़या आहट सुनकर फुर्र से उड़ गई। माँ होती तो कहती, ‘इसे मत उड़ाना, यह बढ़त की निशानी है।’ फाख्ता का एक जोड़ा अंदर चोग चुग्ग चुग रहा था, ठीक बीच में कमरे में नि:शंक भाव से।‘घर के अंदर बुरे होते हैं ये जंगली पखेरू... उड़ा इन्हें।’ माँ की आवाज गूंजी। मैंने यंत्रवत् एक कंकर उठाकर जोर से उधर फेंका। फड़फड़ाकर फाख्ता उड़ गई। चचेरा भाई दौड़ा आया। शायद वह मुझे देख रहा था।
‘सांप तो नहीं था ? यहाँ एक रहता है आजकल।’ भाई ने दूर से देखकर कहा।
‘सांप!’ मैं चौंका, ‘नहीं-नहीं, फाख्ता थी।’
‘फाख्ता !’ वह मुझे हैरानी से देखने लगा।
‘रसोई यहीं थी न,’ मैंने कंकर मारने की झेंप मिटाने के लिए कहा। ‘रसोई, न-न, यहाँ नहीं थी, वह तो अगले कमरे में थी जो गिर गया है। यह जो है उसकी दीवार।’ मैं रसोई वाली जगह से थोड़ी दूर बैठ गया। सच ही रसोई की थोड़ी सी दीवार बची थी, जहाँ पर धुएं के निकास के लिए सुराख बना था।
ढहा हुआ घर सजीव और साकार हो गया। एकदम जिंदा। किसी बुजुर्ग की आत्मा की तरह वह मुझे
बोल उठा।रसोई में माँ के चूल्हे पर चढ़ी सब्जी की भीनी-भीनी गंध फैल रही है, चहुं ओर। न जाने कैसे, माँ चाहे उबालकर ही बनाए, हर चीज़ का अपना ही स्वाद होता है। चूल्हे में जली आग पता नहीं कितनी पीढि़यों से चली आ रही है, पता नहीं वही आदिम आग है, जो कभी अकेला बुजुर्ग यहाँ बसने के साथ अपने साथ लाया था। उपले की राख में छिपी आग हर रात के बाद सुबह ताजा होकर निकलती है। हर रात चूल्हे में उपले दबाती हुइ माँ कहती है– ‘आग मांगी नहीं जाती पगले।’ यह घर की बरकत होती है। यही आग अच्छे और बुरे काम में इस्तेमाल होती है।
पिता हुक्का गुड़गुड़ा रहे हैं, साथ के कमरे में। भाई-बहन कभी अंदर कभी आंगन में भाग रहे हैं। जब ज्यादा हल्ला मचाते हैं तो पिता हुक्के से मुंह हटाकर हुंकार भरते हैं। और हम सब रसोई में दुबक जाते हैं।
‘जिनके घर नहीं होते, वे कहाँ रहते हैं भैया।’ भाई के इस अबोध प्रश्न ने मेरी तंद्रा भंग कर दी। एक खालीपन मुझे लील गया। सच, कहाँ रहेंगे वे, जिनके घर ढहते हैं। घर कवच है जो मर्मस्थलों की रक्षा करता है। सच, घर अपने शरीर की तरह है। बहुत ही अपना, बहुत ही आत्मीय। एकदम निजी। घर एक जानी-पहचानी जगह स्थिर होता है। जाना-पहचाना आंगन, पहचाना पिछवाड़ा, बाग-बागीचा, वहाँ घुप्प अंधेरे में भी सुई तक ढूंढी जा सकती है।
यह घर भी वैसा ही था। अनुराग भरा, एकदम अपना। बैठक में पिता का तख्तपोश, उनके बैठने से घिसी दीवार, जिसके सहारे हर सफलता-असफलता के बाद पिता लेट जाते। कौन-सी खिड़की से कौन-सा दृश्य दिखेगा, कहाँ रिमझिम बारिश आंगन में कुकुरमुत्ते की तरह बरसेगी, कहाँ हवा से लहराते आम के बौर दिखेंगे, कहाँ से लहराते बांस... सब जाना पहचाना।
घर बनता है बड़े चाव से, बड़े अरमान से। बुजुर्गों के मन का नक्शा घर में साकार होता है।
वे बहुत बदनसीब होते हैं, जिनके घर ढहते हैं।
बरसात की शाम थी वह। गड़गड़ाहट के साथ दीवार गिरी थी। पिता हुक्का गुड़गुड़ाते हुए हुक्का हाथ में ही उठाए बाहर आ गए थे। कच्ची ईंटों की धूल उनकी बैठक में भर गई। उनके चेहरे पर विवशता, घबराहट और मायूसी एक साथ उभर आई। पहले कमरे की पहली दीवार गिरी थी, उस बरसात में। उस समय भाई बाहर नौकरी में थे। मैं केवल मूक दर्शक था। इस दीवार के गिरने के बाद भी घर बरसों टिका रहा। बुजु़र्गों में एक सत होता है। शायद उसी सत के सहारे घर एकदम नहीं गिरा, किन्तु ढहता रहा निरंतर। बहनें ब्याही गईं। पहले भाई ने घर छोड़ा, फिर मेरी नौकरी लग गई। पिता गए। माँ कुछ दिन अकेली घिसटती रही। घर ढहता रहा निरंतर... घर तो परिजनों से ही होता है न। दीवारें, ईंट, गारा तो घर नहीं होता।
अंत में चाचा का पत्र आया– ‘भाई तुम्हारा तो दिल्ली बस गया है। तुम अभी नजदीक हो, इसलिए तुम्हें ही लिख रहा हूँ। घर बिलकुल ढह गया है।’ पत्र पढ़ने पर एक दर्दनाक चीख गूंज गई, जो मेरे मन-मस्तिष्क को बेंधती गई।
घर का ढहना एक भयानक और कंपा देने वाली घटना होती है। बहुत आवाज करता है घर ढहती बार। जैसे भूचाल की स्थिति आ जाती है। और भूचाल आए बिना घर का ढहना और यंत्रणादायक हो जाता है, इसकी गूंज दूर-दूर तक फैलती जाती है।
रसोई की बची हुई दीवार में दो छेद बन गए थे। एक छेद जो पहले का था, जहाँ से धुआं निकलता था। उस छेद से कभी-कभी माँ आंगन में आने की आहट सुनकर देखने का प्रयास करती थी। दो छेद देख लग रहा था, माँ की दो आँखें अब भी देख रही हैं, आंगन में आहट जो हुई है। घर ढहती बार माँ ने कहा होगा– ‘घर ! तू यहाँ से मत ढहना। मेरी आँखों के लिए जगह रखना। मेरे छोटे बेटे ने मेरे पास आना है, जो मुझे बहुत प्यारा है। खाना पकाती बार शाम के समय आंगन में आहट होगी तो मैं उसे यहाँ से देखूंगी। वह चुपचाप बिना आवाज किए आता है। फिर भी उसकी आहट से तो मैं पहचान ही जाती हूँ।’
चाचा के घर रात को ठीक से नींद नहीं आई। रात भर गिरते हुए बूढ़े आदमी के सहारे के लिए फैलाईं बाहें दिखती रहीं। जैसे जमीन फट गई हो और कोई उसमें धंसता जा रहा हो। बुजु़र्ग सहारे के लिए पुकार रहा हो, ‘मुझे बचा लो ! मुझे बचा लो ! मेरी बाहों की ताकल निचुड़ गई है।’
गहराती रात में अंधेरे में डूबते जहाज-सा घर बाहें फैलाए ढहता हुआ दिखता रहा। सुबह मुंह अंधेरे ही में, मैं वापस आने लगा तो चाचा ने कहा, ‘यहीं रहना था, आज तुम्हारा भाई बता रहा था, तू वहाँ रो रहा था। बड़ी बेदण आ रही थी... जिस माटी में बढ़े हैं बच्चे, उसका मोह तो होगा ही। अब क्या करना, ऐसा ही है संसार।’ उन्होंने उच्छ्वास लिया।
जब मैंने चलने से पहले पैर छुए तो उन्होंने कहा, ‘हाँ, यदि तुम्हारा यहाँ बसने का इरादा न हो, तो बता देना। जमीन बेचनी हो तो पहले हमें ही पूछना भाई।’
चलती बार बाहर से मैंने नीचे देखा, घर अभी अंधेरे में डूबा हुआ था।
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जन्म:24 सितम्बर 1949, गांव –अरला, पालमपुर तहसील(हिमाचल प्रदेश)शिक्षा:एम ए (हिंदी), हिमाचल विश्वविद्यालय।
कृतियाँ :सात कहानी संग्रह, दो उपन्यास, दो काव्य संकलन, दो नाटक, दो शोध प्रबंध, चार यात्रा वृतांत। इसके अतिरिक्त, चार कहानी संकलन, दो काव्य संकलनों का संपादन। सोमसी, हिमभारती आदि सरकारी पत्रिकाओं का संपादन।
संप्रति–हिमाचल कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी के सचिव।
दूरभाष–09418085595
ग़ज़लें- द्विजेन्द्र ‘द्विज’
(1)
ख़ुद तो ग़मों के ही रहे हैं आस्माँ पहाड़
लेकिन ज़मीन पर हैं बहुत मेह्र्बाँ पहाड़
हैं तो बुलन्द हौसलों के तर्जुमाँ पहाड़
पर बेबसी के भी बने हैं कारवाँ पहाड़
थी मौसमों की मार तो बेशक बडी शदीद
अब तक बने रहे हैं मगर सख़्त-जाँ पहाड़
सीने सुलग के हो रहे होंगे धुआँ-धुआँ
ज्वालामुखी तभी तो हुए बेज़बाँ पहाड़
पत्थर-सलेट में लुटा कर अस्थियाँ तमाम
मानो दधीचि-से खड़े हों जिस्मो-जाँ पहाड़
नदियों,सरोवरों का भी होता कहाँ वजूद
देते न बादलों को जो तर्ज़े-बयाँ पहाड़
वह तो रहेगा खोद कर उनकी जड़ें तमाम
बेशक रहे हैं आदमी के सायबाँ पहाड़
सीनों से इनके बिजलियाँ,सड़कें गुज़र गईं
वन,जीव,जन्तु,बर्फ़,हवा,अब कहाँ पहाड़
कचरा,कबाड़,प्लास्टिक उपहार में मिले
सैलानियों के ‘द्विज’, हुए हैं मेज़बाँ पहाड़
(2)
ख़ुद भले ही झेली हो त्रासदी पहाड़ों ने
बस्तियों को दे दी है हर ख़ुशी पहाड़ों ने
ख़ुद तो जी हमेशा ही तिश्नगी पहाड़ों ने
सागरों को दी लेकिन हर नदी पहाड़ों ने
आदमी को बख़्शी है ज़िन्दगी पहाड़ों ने
आदमी से पाई है बेबसी पहाड़ों ने
हर क़दम निभाई है दोस्ती पहाड़ों ने
हर क़दम पे पाई है बेरुख़ी पहाड़ों ने
मौसमों से टकरा कर हर क़दम पे दी सबके
जीने के इरादों को पुख़्तगी पहाड़ों ने
देख हौसला इनका और शक्ति सहने की
टूट कर बिखर के भी उफ़ न की पहाड़ों ने
नीलकंठ शैली में विष स्वयं पिए सारे
पर हवा को बख़्शी है ताज़गी पहाड़ों ने
रोक रास्ता उनका हाल जब कभी पूछा
बादलों को दे दी है नग़्मगी पहाड़ों ने
लुट-लुटा के हँसने का योगियों के दर्शन-सा
हर पयाम भेजा है दायिमी पहाड़ों ने
सबको देते आए हैं नेमतें अज़ल से ये
‘द्विज’ को भी सिखाई है शायरी पहाड़ों ने.
(3)
पर्वतों जैसी व्यथाएँ हैं
‘पत्थरों’ से प्रार्थनाएँ हैं
मूक जब संवेदनाएँ हैं
सामने संभावनाएँ हैं
रास्तों पर ठीक शब्दों के
दनदनाती वर्जनाएँ हैं
साज़िशें हैं ‘सूर्य’ हरने की
ये जो ‘तम’ से प्रार्थनाएँ हैं
हो रहा है सूर्य का स्वागत
आंधियों की सूचनाएँ हैं
घूमते हैं घाटियों में हम
और कांधों पर ‘गुफ़ाएँ’ हैं
आदमी के रक्त पर पलतीं
आज भी आदिम प्रथाएँ हैं
फूल हैं हाथों में लोगों के
पर दिलों में बद्दुआएँ हैं
स्वार्थों के रास्ते चल कर
डगमगाती आस्थाएँ हैं
ये मनोरंजन नहीं करतीं
क्योंकि ये ग़ज़लें व्यथाएँ हैं
छोड़िए भी… फिर कभी सुनना
ये बहुत लम्बी कथाएँ हैं.
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‘पत्थरों’ से प्रार्थनाएँ हैं
मूक जब संवेदनाएँ हैं
सामने संभावनाएँ हैं
रास्तों पर ठीक शब्दों के
दनदनाती वर्जनाएँ हैं
साज़िशें हैं ‘सूर्य’ हरने की
ये जो ‘तम’ से प्रार्थनाएँ हैं
हो रहा है सूर्य का स्वागत
आंधियों की सूचनाएँ हैं
घूमते हैं घाटियों में हम
और कांधों पर ‘गुफ़ाएँ’ हैं
आदमी के रक्त पर पलतीं
आज भी आदिम प्रथाएँ हैं
फूल हैं हाथों में लोगों के
पर दिलों में बद्दुआएँ हैं
स्वार्थों के रास्ते चल कर
डगमगाती आस्थाएँ हैं
ये मनोरंजन नहीं करतीं
क्योंकि ये ग़ज़लें व्यथाएँ हैं
छोड़िए भी… फिर कभी सुनना
ये बहुत लम्बी कथाएँ हैं.
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नाम: द्विजेन्द्र ‘द्विज’जन्म: 10 अक्तूबर,1962.
शिक्षा: हिमाचल प्रदेश विश्व विद्यालय के सेन्टर फ़ार पोस्ट्ग्रेजुएट स्ट्डीज़,धर्मशाला से
अँग्रेज़ी साहित्य में सनातकोत्तर डिग्री
प्रकाशन: जन-गण-मन(ग़ज़ल संग्रह)प्रकाशन वर्ष-२००३
कई संपादित संकलनों में ग़ज़लें संकलित।
सम्प्रति: प्राध्यापक:अँग्रेज़ी,ग़ज़लकार, समीक्षक
ई-मेल : dwij.ghazal@gmail.com
दूरभाष : 094184-65008
व्यंग्य
जुर्माना यानी जुर्म का आना
अविनाश वाचस्पति
आजकल देश में जुर्माना लगाने पर ज्यादा जोर है, वसूलने के संबंध में ले देकर भी काम चला लिया जाता है। यह उस समय की स्थिति पर निर्भर करता है। देश को विकास की ओर खींचने में अर्थव्यवस्था की महती भूमिका से कोई अर्थशास्त्री पल्ला नहीं झाड़ सकता है और हमारे देश की इस अर्थ की व्यवस्था के विकास के लिए जुर्माने से बढ़कर कोई विकल्प है ही नहीं। ट्रैफिक नियमों के तोड़ने या उनकी अनदेखी करने पर जो चाल आन की जाती थी, अब उस चाल का दायरा बढ़ाकर पैदलों पर भी आन कर दिया गया है। बल्कि बाकायदा उसे अमली जामा पहना दिया गया है। दिलवालों की दिल्ली में रोज पैदलों से वसूल किया जा रहा जुर्माना इसकी मजबूत मिसाल है। हम जब गाड़ी चलाते हैं तब भी नियमों का कहां ध्यान रखते हैं, जो पैदल चलने पर रखेंगे।
वैसे जुर्माना में भी जुर्म का आना ही छिपा है। आप जुर्म किए जाओ, हम आकर चाल आन कर देंगे यानी चालान। वैसे मेरा यह मानना है कि पहले सख्ती साइकिल चालकों के साथ की जानी चाहिए थी, फिर पैदलों का नंबर आना था। परंतु राष्ट्रमंडलीय खेलों की वजह से साइकिल चालकों को इग्नोर कर पैदलों का नंबर पहले आ गया। जबकि आप हर चौराहे, सड़क पर देख सकते हैं कि साइकिल चालक कितने धड़ल्ले से ट्रैफिक सिग्नलों का उल्लंघन किए जा रहे हैं। वे लाल बत्ती होने पर तो जरूर सड़क क्रास करते हैं।
इससे यह भी जाहिर होता है कि सरकार को साइकिल वालों से ज्यादा चिंता पैदल चलने वालों की है। उनमें भविष्य के गाड़ी स्वामी और चालक होने की संभावनाएं छिपी हुई हैं जबकि साइकिल स्वामी चालकों के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं है। पैदल चलने वाला एक दिन जुर्माने से तंग आकर भी गाड़ी ले सकता है। अब टाटा की लखटकिया नैनो कार के नयन दीदार होने से इसकी बलवती इच्छाएं पैदलों के मन में कुलांचे मारने लगी है। साइकिल वाला अपने ऐसे वाहन को किसी भी सूरत में नहीं बदलेगा जिसका न तो चालान होता है और न इंधन ही खरीद कर खर्च करना पड़ता है तथा ट्रैफिक में मनमानी करने की भी भरपूर आजादी है। जब तक साइकिल न चलाई जाए तब तक इन फायदों का कहां पता चलता है, वो तो मैं बतला रहा हूं जबकि यह सीक्रेट है। फिर जब चाहे साइकिल हजार रुपये में खरीद लाओ। इसके साथ हेलमेट पहनने, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने का भी झंझट नहीं है।
अभी तो सरकार पैदल चलने वालों के लिए हेलमेट अनिवार्य करने पर विचार कर रही है। अरे नहीं, उनकी जान की परवाह नहीं है, वो तो जुर्माना लगाने के लिए यह प्रावधान किया जा रहा है। अब यह बतलाने की जरूरत नहीं है कि हेलमेट पहनना कानूनन अनिवार्य करने से उसके न पहनने पर पैदलों से जुर्माना तो वसूला ही जा सकता है। जब इंसान अपना भार ढो सकता है तो दो-ढाई किलो का हेलमेट का भार सहने में क्या दिक्कत है ? वैसे पैदल चलने वालों से एकमुश्त रोड टैक्स वसूलने की योजना भी विचाराधीन है, यह अंदर की खबर है। आप पूछेंगे कि बाहर कैसे आई, अब पैदल तो चलकर नहीं आई है, वरना इस पर भी जुर्माना लग ही जाता।
सरकार आय पर कर से छूट दे रही है। इसके लिए अनेक नेक विकल्प मौजूद हैं। आप पीपीएफ, जीपीएफ, सेंविग बांड, इंश्योरेंस प्लान इत्यादि में अपनी आय का निवेश करके जो छूट प्राप्त कर रहे हैं, अब उसमें जुर्माने की राशि की रसीद पेश करने पर सौ प्रतिशत की दर से छूट मिलेगी। सरकार को यह लाभ होगा कि जुर्माने में वसूला गया पैसा वापस नहीं देना होगा। जबकि अन्य किसी भी योजना में लिया गया पैसा न जाने कितना गुना करके लौटाने की बाध्यता होती है। आप देखेंगे कि आयकर बचाने के लिए जुर्माना कराने के लिए जनवरी से मार्च माह में हर साल तेजी देखने को मिलेगी। जितनी पिछले नौ माह में नहीं वसूली गई उससे अधिक तीन माह में वसूली जाएगी। जुर्माना करने वालों के पास भीड़ मिलेगी, हर जुर्माना करने वाला व्यस्त और त्रस्त मिलेगा। त्रस्त इसलिए कि रसीद सबको चाहिए होगी और उसे वो बनानी होगी। फिर रसीद जल्दी बनवाने के लिए रिश्वत का प्रचलन शुरू हो सकता है। इसलिए चालान काटने वाले घबराएं मत, उनकी ऊपर की आय कम तो हो सकती है पर बिल्कुल बंद नहीं।
खबर आपने भी पढ़ी होगी कि गंदगी फैलाने पर जुर्माना होगा। गंदगी फैलाने में तो हम माहिर हैं। अपनी बालकनी पर खड़े होकर मूंगफली छील-छील कर खा जाते हैं और छिलके नीचे फेंक देते हैं। आजकल तो मूंगफली छील कर खाने और उसके छिलके यहां वहां फेंक कर जाने वाले बिना ढूंढे हजार मिल जाएंगे। बस में, रेल में, प्लेटफार्म पर, आफिस में, बालकनी में, पैदल चलते हुए भी। गंदगी फैलाने पर जो जुर्माना किया जाएगा उसमें सबसे अधिक वसूली तो इसी मद में की जा सकेगी। इसके अलावा अपने घर की पिछली गली में घर का कूड़ा फेंका जाता है। जब पूछा जाए तो सब यही कहते हैं कि हमने नहीं फेंका। इसके लिए सीसीटीवी कैमरों को लगाने की जरूरत होगी। जिससे इन गंदगी फैलाने वाले चतुर सुजानों को पकड़ धकड़ कर जुर्माना वसूला जा सकेगा। पर उनका क्या होगा जो चलती कार से कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलें, केले के छिलके सरेआम सड़क पर फेंक देते हैं। इनके चालान करने के लिए भी पुख्ता इंतजामात करने की दरकार है। इसके लिए हर कार के साथ एक सीसीटीवी कैमरा लगाना कानूनन अनिवार्य कर दिया जाए, जिसकी मॉनीटरिंग ट्रैफिक पुलिस को कहीं पर भी गाड़ी रुकवा कर करने के अधिकार सौंपे जा सकते हैं।
जुर्माने की राष्ट्र के विकास में महती भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। जब सरकार कर वसूलना चाहती है तो बहुत सारे विशेषज्ञ जुट जाते हैं उससे बचाने के रास्ते तलाशने में और उन्हें बता-बता कर फीस वसूलते हैं। पर अभी तक एक भी ऐसा मामला प्रकाश में नहीं आया है कि किसी विशेषज्ञ ने जुर्माने से बचने की तरकीबें बताई हों। बल्कि जब वे भी पैदल चलते हैं तो संभलकर चलते हैं।
अविनाश वाचस्पति
साहित्यकार सदन,
195, सन्त नगर,
नयी दिल्ली 110065
दूरभाष : 09868166586
ई मेल : avinashvachaspati@gmail.com
जुर्माना यानी जुर्म का आना
अविनाश वाचस्पति
आजकल देश में जुर्माना लगाने पर ज्यादा जोर है, वसूलने के संबंध में ले देकर भी काम चला लिया जाता है। यह उस समय की स्थिति पर निर्भर करता है। देश को विकास की ओर खींचने में अर्थव्यवस्था की महती भूमिका से कोई अर्थशास्त्री पल्ला नहीं झाड़ सकता है और हमारे देश की इस अर्थ की व्यवस्था के विकास के लिए जुर्माने से बढ़कर कोई विकल्प है ही नहीं। ट्रैफिक नियमों के तोड़ने या उनकी अनदेखी करने पर जो चाल आन की जाती थी, अब उस चाल का दायरा बढ़ाकर पैदलों पर भी आन कर दिया गया है। बल्कि बाकायदा उसे अमली जामा पहना दिया गया है। दिलवालों की दिल्ली में रोज पैदलों से वसूल किया जा रहा जुर्माना इसकी मजबूत मिसाल है। हम जब गाड़ी चलाते हैं तब भी नियमों का कहां ध्यान रखते हैं, जो पैदल चलने पर रखेंगे।
वैसे जुर्माना में भी जुर्म का आना ही छिपा है। आप जुर्म किए जाओ, हम आकर चाल आन कर देंगे यानी चालान। वैसे मेरा यह मानना है कि पहले सख्ती साइकिल चालकों के साथ की जानी चाहिए थी, फिर पैदलों का नंबर आना था। परंतु राष्ट्रमंडलीय खेलों की वजह से साइकिल चालकों को इग्नोर कर पैदलों का नंबर पहले आ गया। जबकि आप हर चौराहे, सड़क पर देख सकते हैं कि साइकिल चालक कितने धड़ल्ले से ट्रैफिक सिग्नलों का उल्लंघन किए जा रहे हैं। वे लाल बत्ती होने पर तो जरूर सड़क क्रास करते हैं।
इससे यह भी जाहिर होता है कि सरकार को साइकिल वालों से ज्यादा चिंता पैदल चलने वालों की है। उनमें भविष्य के गाड़ी स्वामी और चालक होने की संभावनाएं छिपी हुई हैं जबकि साइकिल स्वामी चालकों के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं है। पैदल चलने वाला एक दिन जुर्माने से तंग आकर भी गाड़ी ले सकता है। अब टाटा की लखटकिया नैनो कार के नयन दीदार होने से इसकी बलवती इच्छाएं पैदलों के मन में कुलांचे मारने लगी है। साइकिल वाला अपने ऐसे वाहन को किसी भी सूरत में नहीं बदलेगा जिसका न तो चालान होता है और न इंधन ही खरीद कर खर्च करना पड़ता है तथा ट्रैफिक में मनमानी करने की भी भरपूर आजादी है। जब तक साइकिल न चलाई जाए तब तक इन फायदों का कहां पता चलता है, वो तो मैं बतला रहा हूं जबकि यह सीक्रेट है। फिर जब चाहे साइकिल हजार रुपये में खरीद लाओ। इसके साथ हेलमेट पहनने, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने का भी झंझट नहीं है।
अभी तो सरकार पैदल चलने वालों के लिए हेलमेट अनिवार्य करने पर विचार कर रही है। अरे नहीं, उनकी जान की परवाह नहीं है, वो तो जुर्माना लगाने के लिए यह प्रावधान किया जा रहा है। अब यह बतलाने की जरूरत नहीं है कि हेलमेट पहनना कानूनन अनिवार्य करने से उसके न पहनने पर पैदलों से जुर्माना तो वसूला ही जा सकता है। जब इंसान अपना भार ढो सकता है तो दो-ढाई किलो का हेलमेट का भार सहने में क्या दिक्कत है ? वैसे पैदल चलने वालों से एकमुश्त रोड टैक्स वसूलने की योजना भी विचाराधीन है, यह अंदर की खबर है। आप पूछेंगे कि बाहर कैसे आई, अब पैदल तो चलकर नहीं आई है, वरना इस पर भी जुर्माना लग ही जाता।
सरकार आय पर कर से छूट दे रही है। इसके लिए अनेक नेक विकल्प मौजूद हैं। आप पीपीएफ, जीपीएफ, सेंविग बांड, इंश्योरेंस प्लान इत्यादि में अपनी आय का निवेश करके जो छूट प्राप्त कर रहे हैं, अब उसमें जुर्माने की राशि की रसीद पेश करने पर सौ प्रतिशत की दर से छूट मिलेगी। सरकार को यह लाभ होगा कि जुर्माने में वसूला गया पैसा वापस नहीं देना होगा। जबकि अन्य किसी भी योजना में लिया गया पैसा न जाने कितना गुना करके लौटाने की बाध्यता होती है। आप देखेंगे कि आयकर बचाने के लिए जुर्माना कराने के लिए जनवरी से मार्च माह में हर साल तेजी देखने को मिलेगी। जितनी पिछले नौ माह में नहीं वसूली गई उससे अधिक तीन माह में वसूली जाएगी। जुर्माना करने वालों के पास भीड़ मिलेगी, हर जुर्माना करने वाला व्यस्त और त्रस्त मिलेगा। त्रस्त इसलिए कि रसीद सबको चाहिए होगी और उसे वो बनानी होगी। फिर रसीद जल्दी बनवाने के लिए रिश्वत का प्रचलन शुरू हो सकता है। इसलिए चालान काटने वाले घबराएं मत, उनकी ऊपर की आय कम तो हो सकती है पर बिल्कुल बंद नहीं।
खबर आपने भी पढ़ी होगी कि गंदगी फैलाने पर जुर्माना होगा। गंदगी फैलाने में तो हम माहिर हैं। अपनी बालकनी पर खड़े होकर मूंगफली छील-छील कर खा जाते हैं और छिलके नीचे फेंक देते हैं। आजकल तो मूंगफली छील कर खाने और उसके छिलके यहां वहां फेंक कर जाने वाले बिना ढूंढे हजार मिल जाएंगे। बस में, रेल में, प्लेटफार्म पर, आफिस में, बालकनी में, पैदल चलते हुए भी। गंदगी फैलाने पर जो जुर्माना किया जाएगा उसमें सबसे अधिक वसूली तो इसी मद में की जा सकेगी। इसके अलावा अपने घर की पिछली गली में घर का कूड़ा फेंका जाता है। जब पूछा जाए तो सब यही कहते हैं कि हमने नहीं फेंका। इसके लिए सीसीटीवी कैमरों को लगाने की जरूरत होगी। जिससे इन गंदगी फैलाने वाले चतुर सुजानों को पकड़ धकड़ कर जुर्माना वसूला जा सकेगा। पर उनका क्या होगा जो चलती कार से कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलें, केले के छिलके सरेआम सड़क पर फेंक देते हैं। इनके चालान करने के लिए भी पुख्ता इंतजामात करने की दरकार है। इसके लिए हर कार के साथ एक सीसीटीवी कैमरा लगाना कानूनन अनिवार्य कर दिया जाए, जिसकी मॉनीटरिंग ट्रैफिक पुलिस को कहीं पर भी गाड़ी रुकवा कर करने के अधिकार सौंपे जा सकते हैं।
जुर्माने की राष्ट्र के विकास में महती भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। जब सरकार कर वसूलना चाहती है तो बहुत सारे विशेषज्ञ जुट जाते हैं उससे बचाने के रास्ते तलाशने में और उन्हें बता-बता कर फीस वसूलते हैं। पर अभी तक एक भी ऐसा मामला प्रकाश में नहीं आया है कि किसी विशेषज्ञ ने जुर्माने से बचने की तरकीबें बताई हों। बल्कि जब वे भी पैदल चलते हैं तो संभलकर चलते हैं।
अविनाश वाचस्पतिसाहित्यकार सदन,
195, सन्त नगर,
नयी दिल्ली 110065
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भाषांतर
धारावाहिक रूसी उपन्यास(किस्त-3)
हाजी मुराद
लियो तोलस्तोय
हिन्दी अनुवाद : रूपसिंह चंदेल
धारावाहिक रूसी उपन्यास(किस्त-3)
हाजी मुराद
लियो तोलस्तोय
हिन्दी अनुवाद : रूपसिंह चंदेल
॥ तीन ॥
बैरकों की खिड़कियों और सैनिकों के कुटीरों में रोशनी बहुत पहले बुझ चुकी थी, लेकिन छावनी के भव्य-भवन की सभी खिड़कियाँ रौशन थीं। यह कुरियन रेजीमेण्ट के कर्नल प्रिन्स माइकल साइमन वोरेन्त्सोव का घर था, जो राज दरबार के एक उच्च अधिकारी और कमाण्डर-इन-चीफ का पुत्र था। वोरोन्त्सोव इस घर में अपनी पत्नी मेरी वसीलीव्ना के साथ रहता था, जो पीटर्सबर्ग की एक सुन्दरी थी। उसके रहन-सहन में एक प्रकार की ऐसी विशिष्टता थी जो काकेशस के इस छोटी छावनी वाले कस्बे में पहले कभी नहीं देखा गया था। वारोन्त्सोव और उसकी पत्नी सोचते कि वे अभावों से भरपूर बहुत साधारण जीवन जी रहे थे, फिर भी स्थानीय निवासी उनके असाधारण विलासितापूर्ण रहन-सहन से विस्मित थे।
आधी रात का समय था। वोरोन्त्सोव अपने विशाल ड्राइंग रूम में, जिसमें कालीन बिछा हुआ था और लंबे भारी परदे पड़े हुए थे, अतिथियों के साथ मेज पर ताश खेल रहा था, जिस पर चार मोमबत्तियाँ जल रही थीं। खिलाडि़यों में एक स्वयं कर्नल वारोन्त्सोव था। उसका चेहरा लंबा, बाल सुन्दर थे और उसने राज्याधिकारी होने के चिन्ह धारण कर रखे थे। उसका साथी पीटर्सबर्ग विश्वविद्यालय का एक स्नातक था, जिसे प्रिन्सेज ने अपने पहले पति से उत्पन्न पुत्र के ट्यूटर के रूप में नियुक्त किया हुआ था। वह उदास भावाकृतिवाला एक सांवला नौजवान था। दो अधिकारी उनके विरुद्ध खेल रहे थे। उनमें से एक चौड़े गाल, गुलाबी चेहरे वाला कम्पनी कमाण्डर पोल्तोरत्स्की था, जो गारद सेना से स्थानांतरित होकर आया था और दूसरा रेजीमंण्टल एडजूटेण्ट था, जो अपने सुन्दर चेहरे पर ठण्डी भावाकृति लिए सीधा तना हुआ बैठा था। बड़ी आंखों और काली भौंहोवाली सुन्दर महिला प्रिन्सेज मेरी वसीलीव्ना, पोल्तोरत्स्की के बगल में बैठी थी और उसके पैरों को अपने पेटीकोट से छू रही थी और उसके हाथों की ओर देख रही थी। उसके बोलने, उसके देखने और मुस्कराने, उसक शरीर के संचलन और उसके द्वारा प्रयोग किये गये परफ्यूम, से सम्मोहित पोल्तोरत्स्की उसका सान्निध्य पाने के अतिरिक्त सब ओर से बेखबर था। उसने एक के बाद दूसरी गलती की थी और इससे उसका साथी भड़क उठा था।
‘‘नहीं यह तो हद है ! तुमने दूसरा इक्का बरबाद कर दिया।” लाल-पीला होता हुआ एड्जूटेण्ट बोला, क्योंकि पोल्तोरत्स्की एक इक्का फेक चुका था।
पोल्तोरत्स्की ने अपनी सौम्य बड़ी काली आंखों से क्रुद्ध एड्जूटेण्ट की ओर न समझने वाले भाव से ऐसे देखा मानो वह अभी-अभी सोकर उठा था।
‘‘अच्छा, उसे क्षमा कर दें।” मुस्कराती हुर्ह मेरी वसीलीव्ना ने कहा। “मैनें तुमको इतना बताया था,” उसने पोल्तोरत्स्की से कहा। ‘‘लेकिन तुमने मुझे सब गलत बताया था।” पोल्तोरत्स्की ने मुस्कराते हुए कहा ।
‘‘सच ?” वह बोली, और मुस्कराई भी। पोल्तोरत्स्की इस मुस्कराहट से इतना उत्तेजित और प्रसन्न हुआ कि वह शर्म से लाल हो उठा और उत्तेजित-सा पत्ते फेटने लगा ।
‘‘तुम्हारे पत्ते नहीं।” एड्जूटेण्ट कठोरतापूर्वक बोला और अपने गोरे हाथों को घुमाते हुए पत्ते फेटने लगा मानो वह उनसे यथाशीघ्र मुक्ति पा लेना चाहता था।
एक नौकर ड्राइंगरूम में प्रविष्ट हुआ और बोला कि ड्यूटी अफसर ने प्रिन्स से भेंट करने का अनुरोध किया है।
‘‘सज्जनों, क्षमा करें,” अंग्रेजी लहजे में प्रिन्स ने रशियन में कहा, ‘‘मेरी तुम मेरा स्थान ग्रहण कर लो।”
‘‘मैं ?” फुर्ती से पूरी तरह खड़ी होती हुई प्रिन्सेज ने पूछा। उसके सिल्क के कपड़ों में सरसराहट हुई और एक प्रसन्न महिला की भाँति उल्लसित होती हुई वह मुस्काराई।
‘‘मैं सदैव हर बात के लिए तैयार रहता हूँ,” एड्जूटेण्ट बोला। अपने विरुद्ध प्रिन्सेज के खेलने से वह बहुत प्रसन्न था, क्योंकि प्रिन्सेज को खेलने का बिल्कुल ज्ञान नहीं था। पोल्तोरत्स्की ने सहजता से बाहें फैलायीं और मुस्कराया।
प्रिन्स जब ड्राइंग रूम में वापस लौटा खेल समाप्त हो रहा था। वह बहुत उत्तेजित और प्रसन्न था।
‘‘सोचो, मैं क्या सूचित करने वाला हूँ।”
‘‘क्या ?”
‘‘आओ हम शैम्पेन पियें।”
‘‘मैं सदैव तैयार रहता हूँ ,” पोल्तोरत्स्की ने कहा।
‘‘हां, कितना सुखद ,” एड्जूटेण्ट बोला।
‘‘वसीली ! हम लोगों को शैम्पेन सर्व करो !” प्रिन्स ने कहा।
‘‘ तुम्हें क्यों बुलाया था?” मेरी वसीलीव्ना ने पूछा।
‘‘ड्यूटी अफसर एक दूसरे आदमी के साथ आया था?”
‘‘कौन? क्यों?” मेरे वीसीलीव्ना ने उत्सुकतापूर्वक पूछा।
‘‘मैं नहीं बता सकता,” वारोन्त्सोव बोला।
‘‘तुम नहीं बता सकते,” मेरी वसीलीव्ना ने दोहराया, ‘‘हम उस पर विचार कर लेगें।”
शैम्पेन सर्व की गई। अतिथियों ने एक-एक गिलास पिया, खेल समाप्त किया, व्यवस्थित हुए और जाने लगे।
‘‘आपकी कम्पनी को कल जंगल के लिए तैनात किया गया है, क्या नहीं? ” प्रिन्स ने पोल्तोरत्स्की से पूछा।
‘‘हाँ, मेरी ... वहाँ कुछ खास है ?”
‘‘तब मैं आपसे कल मिलूंगा।” प्रिन्स ने फीकी मुस्कान के साथ कहा।
‘‘मैं गौरवान्वित हूँ,” मेरी वसीलीव्ना से हाथ मिलाने के विचार के संभ्रम में पोल्तोरत्स्की प्रिन्स के शब्दों को पूरी तरह ग्रहण नहीं कर पाया था।
मेरी वसीलीव्ना ने, प्राय: की भाँति, उसके हाथ को न केवल दृढ़ता से दबाया बल्कि जोरदार ढंग से हिलाया भी। उसने उसे एक बार पुन: उस समय की त्रुटि की याद दिलाई जब वह क्लबों का संचालन किया करता था। वह उस पर मुस्कराई।
‘‘एक मोहक, उत्तेजक और अर्थपूर्ण मुस्कान,” पोल्तोरत्स्की ने सोचा। वह ऐसी उल्लासपूर्ण मनस्थिति में घर गया, जिसे समाज में उसकी तरह पढ़े-लिखे, उसी की भाँति जन्मे और पले-बढ़े लोग ही समझ सकते थे जो उसी की तरह महीनों के एकाकी सैनिक जीवन के बाद अचानक अपनी किसी पूर्व परिचित महिला से मिलते हैं। और प्रिन्सेज वोरोन्त्सोव एक विशिष्ट महिला थीं।
जब वह अपने निवास पर पहुँचा उसने दरवाजे को धक्का दिया, लेकिन चिटखनी अंदर से बंद थी। उसने खटखटाया, लेकिन वह बंद ही रहा। उसका धैर्य चुक गया और उसने बूट और तलवार दरवाजे पर मारना शुरू कर दिया। अंदर पदचाप सुनाई पड़ी और पोल्तोरत्स्की के नौकर ववीला ने चिटकनी खोली।
‘‘ मूर्ख, तुमने बंद क्यों किया था ?”
‘‘लेकिन सच, अलेक्सिस व्लादीमीर …।”
‘‘दोबारा पी ? मैं तुझे सबक सिखा दूँगा …।”
पोल्तोरत्स्की ववीला को लगभग मारने ही वाला था, लेकिन फिर उसने उसे सुधारने की सोचा।
‘‘तुझे लानत है, सुधरने की कभी मत सोचना। चल, मोमबत्ती जला।”
‘‘इसी क्षण।”
ववीला बुरी तरह पिये हुए था। वह क्वार्टर मास्टर के जन्म दिन के आयोजन में शामिल हुआ था। जब वह घर लौटकर आया, वह अपने जीवन की तुलना क्वार्टर मास्टर इवान मैथ्यू के जीवन से करने लगा। इवान मैथ्यू की निश्चित आय थी, वह विवाहित था और आशा करता था कि एक वर्ष में पैसे देकर वह अपने को सेना से मुक्त कर लेगा। ववीला छोटी आयु में ही नौकरी में आ गया था, और इस समय वह चालीस से ऊपर था, अविवाहित था और अपने अनियंत्रित स्वामी के साथ यौद्धिक जीवन जीता आ रहा था। वह एक अच्छा मालिक था और कभी-कभी ही उसे पीटता था, लेकिन यह भी कोई ज़िन्दगी थी ! ‘‘जब वह काकेशस से लौटा था तब उसने मुझे स्वतंत्र करने का वायदा किया था, लेकिन मैं अपनी स्वतंत्रता का करूंगा क्या ? यह एक कुत्ते जैसी ज़िन्दगी है,” ववीला ने सोचा था। वह इतना उनींदा था कि उसने इस भय से दरवाजा बंद कर लिया था और सो गया था कि कोई घर में घुस आ सकता था और कुछ भी चोरी कर सकता था।
पोल्तोरत्स्की उस कमरे में प्रविष्ट हुआ जहाँ वह अपने साथी तिखोनोव के साथ सोता था।
‘‘अच्छा, तुम हार गये ?” उनींदे स्वर में तिखोनोव बोला।
‘‘भगवन, नहीं ! मैनें सत्तरह रूबल जीते और हमने एक बोतल क्लिकोट पी।”
‘‘और मेरी वसीलीव्ना को देखते रहे ?”
‘‘और मेरी वसीलीव्ना को देखता रहा ।” पोल्तोरत्स्की ने दोहराया।
‘‘जल्दी ही हमारे जागने का समय हो जाएगा।” तिखोनोव ने कहा, ‘‘हमें छ: बजे चल देने के लिए उठना है।”
‘‘ववीला,” पोल्तोरत्स्की चीखा, ‘‘ध्यान रहे, मुझे ठीक पाँच बजे जगा देना।”
‘‘मैं कैसे जगा सकता हूँ जब आप मुझसे झगड़ते हैं ?”
‘‘मैं कहता हूँ, मुझे जगा देना। सुना तुमने?”
‘‘बहुत अच्छा।”
ववीला अपने मालिक के जूते और कपड़े लेकर बाहर निकल गया।
पोल्तोरत्स्की बिस्तर पर गया और एक सिगरेट जलायी। उसने बत्ती बुझायी और मुस्कराया। अंधेरे में उसने मेरी वसीलीव्ना का मुस्कराता चेहरा अपने सामने देखा।
वोरोन्त्सोव दम्पति तुरंत बिस्तर पर नहीं गया था। जब अतिथि चले गये थे तब मेरी वसीलीव्ना अपने पति के पास आयी थी और चेहरे पर कठोरता ओढे़ उसके सामने खड़ी हो गयी थी।
‘‘हाँ, तुम्हे मुझे बाताना ही है ?”
‘‘लेकिन मेरी प्यारी … ।”
‘‘तुम मुझे ‘मेरी प्यारी’ मत कहो। वह एक दूत है, क्या नहीं है ?”
‘‘सच, मैं तुम्हें नहीं बता सकता।”
‘‘तुम नहीं बता सकते ? तब वह मैं तुम्हें बताऊंगी।”
‘‘तुम ?”
‘‘वह हाजी मुराद है ? क्या वह नहीं है ?” प्रिन्सेज ने कहा, जिसने कुछ दिन पहले हाजी मुराद के साथ हुए समझौते के विषय में सुना था। उसने अनुमान लगाया था कि हाजी मुराद स्वयं उसके पति से मिलने आया था।
वोरोन्त्सोव इससे इंकार नहीं कर सका, लेकिन हाजी मुराद की उपस्थिति के विषय में पत्नी का भ्रम निवारण करते हुए उसने कहा, कि वह केवल एक दूत था जिसने उसे बताया था कि अगले दिन हाजी मुराद उससे वहाँ मिलेगा जहाँ जंगल काटा जा रहा था।
छावनी के उकताहटपूर्ण जीवन-चर्या में युवा वोरोन्त्सोव दम्पति इस उत्तेजनापूर्ण समाचार से प्रसन्न थे। वे इस विषय में बातें करते रहे कि इस समाचार से उसके पिता कितना प्रसन्न होंगे। और जब वे सोने के लिए बिस्तर पर गये रात के दो बज चुके थे।
(क्रमश: जारी…)
अनुवादक संपर्क:बी-3/230, सादतपुर विस्तार
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नासिरा शर्मा लंदन के हाउस
ऑफ लॉर्ड्स में कथा (यू.के.) सम्मान प्राप्त करेंगी
कथा (यू के) के मुख्य सचिव एवं प्रतिष्ठित कथाकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन से सूचित किया है कि वर्ष 2007 के लिए अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान वरिष्ठ उपन्यासकार श्रीमती नासिरा शर्मा को
सामयिक प्रकाशन से 2005 में प्रकाशित उपन्यास कुइयांजान पर देने का निर्णय लिया गया है। इस सम्मान के अन्तर्गत दिल्ली - लंदन - दिल्ली का आने जाने का हवाई यात्रा का टिकट (एअर इंडिया द्वारा प्रायोजित) एअरपोर्ट टैक्स़, इंगलैंड के लिए वीसा शुल्क़, एक शील्ड, शॉल, लंदन में एक सप्ताह तक रहने की सुविधा तथा लंदन के खास खास
दर्शनीय स्थलों का भ्रमण आदि शामिल होंगे। यह सम्मान श्रीमती नासिरा शर्मा को लंदन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में 27 जुलाई 2008 की शाम को एक भव्य आयोजन में प्रदान किया जायेगा।इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट कì


